GODDA NEWS: हूल क्रांतिवीर बाबा बैजल फॉरेन का 195 वीं जयंती धूमधाम से मनाया गया





ग्राम समाचार, गोड्डा ब्यूरो रिपोर्ट:- आज 1 मार्च 2022 को बाबा बैजल सोरेन की 195वां जयंती उनके जन्म स्थली गोड्डा जिला अंतर्गत सुंदर पहाड़ी प्रखंड के काल्हाझोर गांव में स्मारक स्थल पर मनाई गई। मौके पर श्रद्धांजलि देने पहुंचे हूल फाउंडेशन के संस्थापक अध्यक्ष संजीव कुमार महतो ने बताया कि बाबा बैजल सोरेन संथाल हूल के अग्रणी योद्धाओं में से हैं। उन्होंने बताया कि बैजल बाबा के वंशजों व ग्रामीणों एवं स्थानीय समाजिक कार्यकर्ताओं के द्वारा 2005 से लगातार 1 मार्च को पूजा पाठ व खेल, मेला, नागड़े नाच आदि का आयोजन कर जयंती मनाई जाती है। इस वर्ष भी वंसजों में से बैजल सोरेन, लखीराम सोरेन, छोटा सोरेन, तालामय मुर्मू, सुनीता सोरेन, बिट्टू टुडू आदि के साथ मिलकर मेला, खेल, लांगड़े नाच आदि का आयोजन बिनोद मुर्मू झामुमो प्रखंड अध्यक्ष व मुखिया सोहन हांसदा प्रधान, बाबुलाल टुडू योग मांझी एवं ग्रामीणों द्वारा बृहद आयोजन किया गया था। 

*आंदोलनकारी के साथ अनोखी प्रेम कहानी है बैजल की*

बैजल सोरेन के बारे में कहा जाता है कि झारखंड में 19वीं सदी की एक अनोखी प्रेम कहानी का नायक था बैजल सोरेन. उन्होंने शोषण के विरूद्ध हथियार उठाया और सलाखों के पीछे पहुंच गए। सलाखों के पीछे भी बैजल अपनी बांसुरी और सारंगी से दूर नहीं हो सके। इसी बांसुरी की धुन पर अंग्रेज जेलर की बेटी मर मिटी और वो बैजल के साथ शादी की जिद पर अड़ गई। अंततः अंग्रेज जेलर ने बैजल का फांसी रोकवाकर उसे अपने साथ लेकर चले गए। एक कहानी यह भी है कि विद्रोह भड़के नहीं इसलिए बैजल को लापता कर दिया गया था। 

*काल्हाझोर के जर्रे-जर्रे में हैं बैजल की क्रांतिकारी गाथा*

बैजल सोरेन का जन्म गोड्डा जिला मुख्यालय से करीब 33 किलोमीटर दूर सुंदर पहाड़ी प्रखंड के काल्हाझोर गांव में हुआ था। इस गांव के जर्रे-जर्रे में बैजल सोरेन की क्रांतिकारी गाथा और प्रेम की कहानी बसी है। इस गांव की गलियों में अब भी उनकी बांसुरी की धुन का अहसास कर सकते हैं। ये कहानी अंग्रेजों के दमनकारी समय की है। जब बैजल सोरेन ने संताल परगना में साहूकारों के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंक दिया था। बैजल ने एक तंबोली साहूकार की हत्या कर दी थी। इसके बाद ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें गिरफ्तार कर मुर्सिदाबाद की सिउड़ी जेल भेज दिया। अदालत ने बैजल बाबा सोरेन को मौत की सजा सुनाई लेकिन बैजल अपनी धुन में मस्तमौला नाचते गाते रहते थे। बैजल की इस अदा पर ब्रिटिश जेलर की बेटी का दिल आ गया और वो शादी की जिद पर अड़ गई। दरअसल 1855 में बिहार और बंगाल के मध्य स्थित जंगल तराई के आदिवासी मुलवासी लोगों ने जमीनदारों, महाजनों और अंग्रेज कर्मचारियों के अत्याचार के विरुद्ध विद्रोह करना शुरू कर दिया था। इसी दौर में गोड्डा जिले के सुंदर पहाड़ी प्रखंड के कल्हाजोर गांव के एक युवक बैजल सोरेन भी महाजनी प्रथा के शोषण का शिकार होकर बागी बन चुके थे। बैजल सोरेन ने एक तंबोली साहूकार से कुछ रुपए उधर लिए थे, जिसका सूद कई बार चुकाने के बाद भी कर्ज खत्म नहीं हो रहा था। साहूकार ने यहां तक कह दिया कि जिस तरह गाय-बछड़े की संख्या बढ़़ रही है उसी तरह उनके पैसे बढ़़ रहे हैं। फिर क्या था, गायों को दिखाने के बहाने बैजल साहूकार को लेकर पहाड़़ पर गया और वहां बैजल के आंदोलनकारी साथी पहले से मौजूद थे उन्होंने साहुकार का सर धड़ से अलग कर दिया। साहूकार की हत्या के बाद अंग्रेज बैजल को गिरफ्तार करने का प्रयास करने लगे लेकिन कल्हाजोर की पहाड़ियों में छिप कर रहने लगे और आंदोलनकारियों के संग ब्रिटिश के खिलाफ लोगों को संगठित करने लगे। बैजल की एक कमजोरी थी कि बैजल संगीत के बिना नहीं रह सकते थे। अंग्रेजों ने नाच-गाना का कार्यक्रम का आयोजन कराया। पहाड़ों में संगीत के उस कार्यक्रम में बैजल भी पहुंचे और कार्यक्रम के दौरान पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। बैजल को बंगाल की सिउड़ी जेल ले जाया गया। बैजल पैदल ही जाने को तैयार हो गए और अपनी बांसुरी व तानपुरे के साथ नाचते-गाते जेल तक का सफर पूरा किया। जेल में भी वे संगीत से दूर नहीं रहें। इसी बांसुरी की धुन ब्रिटिश जेलर की बेटी के कानों तक पहुंची और वो उसकी दीवानी हो गयी।

*अंग्रेजी मेम के प्रेम ने टाली बैजल की फांसी*

सांवला रंग, घुंघराले बाल और सुंदर कद-काठी के बैजल जितना बड़े आंदोलनकारी थे उतने ही सुंदर बांसुरी बजाते थे, उतना ही अच्छा नाचते गाते भी थे। कुछ लोग का कहना है कि फांसी वाले दिन अंतिम इच्छा में बैजल ने सारंगी और बांसुरी बजाने की बात कही। बैजल की सारंगी की धुन पर अंग्रेज फांसी का समय भूल गए और फांसी टल गई। वहीं जानकारों के अनुसार बेटी के प्यार की जिद के आगे जेलर ने हार मान ली थी और वे बैजल को इंग्लैड लेकर चले गए थे।

*सरकारी लिखित सहायता के बावजूद मुफलिसी में वंशज*

बैजल का परिवार आज भी सुंदरपहाड़ी में पांचवीं छठी पीढ़ी उसी कालाहझोर में मुफलिसी में रह रही है। बैजल की एक मूर्ति कल्हाजोर में लगाई गई है, जहां साल में एक बार जयंती पर मेला लगता है। बैजल की गाथा को किताबों में भी सहेज कर रखा गया है। बंगाल में लोग बैजल नायक के रूप में जाने जाते हैं। बैजल की प्रेम कहानी पर साल 2016 में एक फिल्म भी बनाई गई। चर्चा में है कि करीब दो दशक पूर्व बैजल के अंग्रेज वंशज तलाश करते गोड्डा तक आए थे। बैजल की आंदोलन व प्रेम कहानी दुनिया की चकाचौंध में खो गई लेकिन आदिवासी की अदा पर फिदा अंग्रेजी गोरी मेम के चर्चे आज भी सुंदरपहाड़ी के लोगों की जुबान पर हैं। आज 195 जयंती के मौके पर बैजल के परिवार द्वारा पुजा पाठ के बाद संजीव कुमार महतो, हरे कृष्ण राय, संजय कुंवर, अलका महतो एवं दर्जनों स्थानीय महिला पुरुष बच्चे ने श्रद्धांजलि अर्पित किया।

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Editor - भूपेन्द्र कुमार चौबे

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- राजीव कुमार (Editor-in-Chief)

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