ग्राम समाचार, भागलपुर। बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर की 19वीं अनुसंधान परिषद खरीफ-2020 की दो दिवसीय बैठक कुलपति बिहार कृषि विश्वविद्यालय डा. अजय कुमार सिंह की अध्यक्षता में संपन्न हुई। कुलपति एवं निदेशक शोध डा. आई एस. सोलंकी ने विश्वविद्यालय में चल रहे विभिन्न शोध कार्यों पर गहन समीक्षा की। इस दो दिवसीय अनुसन्धान परिषद बैठक में विभिन्न शोध परियोजनाओं से संबंधित कुल 42 शोध कार्य प्रस्तुत किये गए और विश्वविद्यालय में चल रहे शोध कार्यों पर विस्तार से चर्चा की गयी। कुलपति ने विश्वविद्यालय में चल रहे शोध कार्यों की प्रशंसा करते हुए वैज्ञानिकों को किसानोमुखी कार्य के लिए बधाई दिया। साथ ही कुलपति ने ज्यादा से ज्यादा राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय अनुसन्धान परियोजनाओं को लाने के लिए जोर दिया। निदेशक अनुसंधान ने विश्वविद्यालय में चल रहे शोध कार्यों की सराहना करते हुए इस दिशा में तेजी से कार्य करने का दिशा निर्देश दिया।
इस अनुसंधान परिषद् की बैठक में किसानों के लिए उपयोगी बैंगन की एक नई प्रजाति सबौर कृष्णकली को अनुसंशित किया गया। यह भर्ता बैंगन की बैंगनी रंग के किस्म है तथा इस में बीज बहुत ही कम है। यह बैंगन की एक नई प्रजाति खरीफ एवं शरद व शीत कालीन फसल के लिए उपयुक्त है। इसके साथ ही साथ छः नई कृषि उपयोगी तकनीकों को भी अनुसंशित किया गया। इस अनुसन्धान परिषद् ने सबौर ट्रायकोडर्मा -1 (डॉ अरषद् अनवर एंव डा० विषुनदेव प्रसाद द्वारा विकसित) तकनीक को अनुशंसित किया, जो कि मसूर और चना की सुरक्षित खेती के लिए काफी लाभदायक होगा। यह ट्राइकोडर्मा सूखा एवं 45 डिग्री तापमान तक सहिष्णु है और सूखे एवं क्षारीय परिस्थिति में भी अत्यंत असरकारक है। जो उकठा रोग, कालर रॉट, जड़ सड़न एवं सभी प्रकार के मृदा और बीज जनित रोग को नियंत्रित करता है। विशेष रूप से मसूर और चना में साथ ही साथ फसल की उपज क्षमता को बढ़ाता है। साथ ही साथ विश्वविद्यालय ने पहली बार किसानों के लिए चार तरल जैव उर्वरक (सबौर राइजो, सबौर फॉस्फोबैक्ट्रिन, सबौर नाईट्रोफिक्स, संयुक्त सबौर नाईट्रोफिक्स एव फॉस्फोबैक्ट्रिन) (डा0 महेन्द्र सिंह द्वार विकसित) अनुसंशित किया गया। उपरोक्त अनुशंसित की गई तकनीक रसायनिक उर्वरक की निर्भरता को काफी हद तक कम करने में सहायक सिद्ध होगा। पारंपरिक जुताई उपरान्त धान की सीधी बुआई की तकनीक (डा0 विरेन्द्र कुमार एंव डा0 पूनियां) के अन्तर्गत खेत में गहरी सिंचाई करके खेत की जुताई करने के बाद धान की सीधी बुआई करते हैं। बुआई के 15 और 21 दिन बाद फिर सिंचाई करते हैं। इसमें 15 से 20 दिन बाद बिस्पायरिबैक सोडियम तथा पायराजोसल्फ्यूराँन नामक खरपतवार नाशक दवाओं को 20-20 ग्राम सक्रिय तत्व की मात्रा में अच्धी तरह से छिड़काव करें। इस बैठक में विश्वविद्यालय के सभी अधिष्ठाता, निदेशक गण, प्राचार्य, विभागाध्यक्ष एवं वैज्ञानिक गण सामाजिक दुरी का पूर्णतः पालन करते हुए अनुसन्धान परिषद् में उपस्थित हुए। उप- निदेशक अनुसंधान डा0 शैलबाला देई नें बैठक के दौरान कोविड-19 महामारी से बचने के लिए दिये गये सभी सलाह एवं निर्देशों का पालन करने का अनुरोध करते हुए इस दो दिवसीय अनुसन्धान परिषद् की बैठक को सफलतापूर्वक समापन करने के लिए सभी का धन्यवाद ज्ञापन दिया।
इस अनुसंधान परिषद् की बैठक में किसानों के लिए उपयोगी बैंगन की एक नई प्रजाति सबौर कृष्णकली को अनुसंशित किया गया। यह भर्ता बैंगन की बैंगनी रंग के किस्म है तथा इस में बीज बहुत ही कम है। यह बैंगन की एक नई प्रजाति खरीफ एवं शरद व शीत कालीन फसल के लिए उपयुक्त है। इसके साथ ही साथ छः नई कृषि उपयोगी तकनीकों को भी अनुसंशित किया गया। इस अनुसन्धान परिषद् ने सबौर ट्रायकोडर्मा -1 (डॉ अरषद् अनवर एंव डा० विषुनदेव प्रसाद द्वारा विकसित) तकनीक को अनुशंसित किया, जो कि मसूर और चना की सुरक्षित खेती के लिए काफी लाभदायक होगा। यह ट्राइकोडर्मा सूखा एवं 45 डिग्री तापमान तक सहिष्णु है और सूखे एवं क्षारीय परिस्थिति में भी अत्यंत असरकारक है। जो उकठा रोग, कालर रॉट, जड़ सड़न एवं सभी प्रकार के मृदा और बीज जनित रोग को नियंत्रित करता है। विशेष रूप से मसूर और चना में साथ ही साथ फसल की उपज क्षमता को बढ़ाता है। साथ ही साथ विश्वविद्यालय ने पहली बार किसानों के लिए चार तरल जैव उर्वरक (सबौर राइजो, सबौर फॉस्फोबैक्ट्रिन, सबौर नाईट्रोफिक्स, संयुक्त सबौर नाईट्रोफिक्स एव फॉस्फोबैक्ट्रिन) (डा0 महेन्द्र सिंह द्वार विकसित) अनुसंशित किया गया। उपरोक्त अनुशंसित की गई तकनीक रसायनिक उर्वरक की निर्भरता को काफी हद तक कम करने में सहायक सिद्ध होगा। पारंपरिक जुताई उपरान्त धान की सीधी बुआई की तकनीक (डा0 विरेन्द्र कुमार एंव डा0 पूनियां) के अन्तर्गत खेत में गहरी सिंचाई करके खेत की जुताई करने के बाद धान की सीधी बुआई करते हैं। बुआई के 15 और 21 दिन बाद फिर सिंचाई करते हैं। इसमें 15 से 20 दिन बाद बिस्पायरिबैक सोडियम तथा पायराजोसल्फ्यूराँन नामक खरपतवार नाशक दवाओं को 20-20 ग्राम सक्रिय तत्व की मात्रा में अच्धी तरह से छिड़काव करें। इस बैठक में विश्वविद्यालय के सभी अधिष्ठाता, निदेशक गण, प्राचार्य, विभागाध्यक्ष एवं वैज्ञानिक गण सामाजिक दुरी का पूर्णतः पालन करते हुए अनुसन्धान परिषद् में उपस्थित हुए। उप- निदेशक अनुसंधान डा0 शैलबाला देई नें बैठक के दौरान कोविड-19 महामारी से बचने के लिए दिये गये सभी सलाह एवं निर्देशों का पालन करने का अनुरोध करते हुए इस दो दिवसीय अनुसन्धान परिषद् की बैठक को सफलतापूर्वक समापन करने के लिए सभी का धन्यवाद ज्ञापन दिया।

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