ग्राम
समाचार मिहिजाम।
कोरोना
को लेकर जारी लॉकडाउन की वजह से मजदूरों कि स्थिति डामाडोल हो चुकी है। पुरे देश
में प्रवासी मजदूरों के धैर्य का बाध टूट रहा है। विभिन्न स्थानों में अटके पड़े
मजदूर पैदल ही अपने घर की ओर रवाना हो रहे हैं। कोई रेल की पटरी पकड़ कर तो कोई सड़क
पर पैदल ही तो कोई साइकिल से अपने घरों की ओर चल पड़े हैं। हजारो किलोमीटर यात्रा करने
के बावजूद अभी तक घर नहीं पहुंच पाए हैं, तो कई घर के निकट पहुंचकर खुश हैं। तो
किसी की यात्रा अब समापन की ओर है। पलायन का यह असर अब पश्चिम बंगाल से झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश तक पहुंच गया है। बांकुड़ा, वीरभूम, बर्दमान, रानीगंज, दुर्गापुर, आसनसोल आदि स्थानों से सैंकड़ों श्रमिको
को झारखंड, बिहार के साथ अन्य राज्य जाते देखा जा
रहा है। कोरोना के कारण पिछले 50 दिनों से लॉकडाउन जारी है। लेकिन कोरोना का तांडव
जारी है। पूरे देश के कारोबार से लेकर निर्माण कार्य ठप हो चुका है। कारखाने बंद
हैं। एक महीने तक श्रमिकों का खर्च उठाने के बाद अब तो व्यापारी, सेठ-साहूकारों ने भी हाथ खड़ा कर दिया
है। एक ही झटके मे दाना-पानी के साथ सिर से छत भी छिन जाने से प्रवासी मजदूरों के
सामने विकट समस्या खड़ी हो गई है। अंत मे परिस्थिति से समझौता कर प्रवासी मजदूरों
ने मीलों पैदल यात्रा कर अपने घर जाने का ठान ही नहीं लिया है, बल्कि चल पड़े हैं। कुछ ऐसा ही नजारा
सोमवार को पश्चिम बंगाल के कई इलाकों में देखने को मिला।
रास्ते मे विभिन्न
सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा भोजन वितरण किया जा रहा है, तो कही पुलिस विभाग द्वारा भी असहायों
को खाने पीने की व्यवस्था की जा रही है। लॉकडाउन के बाद मालिक व फैक्टरी के संचालक
व अन्य सबल वर्ग इनका खर्च चला रहे थे, लेकिन उन्होने ने भी हाथ उठा दिया। खाने-पीने और रहने का अन्य कोई
दूसरा चारा नहीं होने कि वजह से वे सभी अपने घर के लिए पैदल ही चल पड़े हैं। कोई
झारखंड के जामताड़ा,
मधुपुर, जसीडीह व अन्य जिलो का रहने वाला है। और तो और कोई बिहार के बक्सर, हाजीपुर, बरौनी इत्यादि के निवासी हैं। श्रमिकों टोलियों मे युवा, महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग
शामिल हैं। साइकिल और रिक्शा वैन पर सामान लाद कर सभी पैदल चल रहे हैं। जहां जो
मिला वही खा लिए और आगे की ओर रवाना हो लिये। मजदूरों से मिली जानकारी के अनुसार
खाने का कुछ सामान लेकर चले तो थे लेकिन सबकुछ समाप्त है। रास्ते मे समाजसेवियों
द्वारा बाटे जाने वाले भोजन के सहारे रास्ता तय किया जा रहा है। रोजाना दस से 12 घटे पैदल चल रहे हैं। थकान
होने पर सड़क किनारे पेंड़ की छांव में आराम कर लेते हैं। रात विद्यालय, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड या फिर यात्री पड़ाव पर
गुजारते हैं। किसी भी तरह से घर पहुंचने की कोशिश में हैं सभी लोग। कुछ श्रमिकों
की मंजिल तो अब नजदीक है। लेकिन दूर जाने वालों के लिए अभी भी मीलो का सफर बाकी
है।
रोहित शर्मा, ग्राम समाचार, मिहिजाम


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