Bhagalpur News:एसएम कॉलेज में आईक्यूएसी सेल के तत्वावधान में "रोल ऑफ माइक्रोब्स इन सस्टेनेबल एग्रीकल्चर" विषय पर व्याख्यान आयोजित, स्थायी व सतत कृषि के लिए जैविक खेती को मिले बढ़ावा - प्रोफेसर हरवंश कौर


ग्राम समाचार, भागलपुर। कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से मिट्टी की गुणवत्ता खत्म हो रही है। लिहाजा इसका असर फसलों के उत्पादन पर भी पड़ रहा है। फसलों की अच्छी गुणवत्ता और अधिक उत्पादकता के लिए पिछले दो दशकों से देश के कई राज्यों में फसल उत्पादन हेतु रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक बढ़ते प्रयोग से वायु, जल और मृदा प्रदूषण में लगातार वृद्धि हो रही है। फलस्वरूप मानव स्वास्थ्य पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। ये बातें बुधवार को सुन्दरवती महिला महाविद्यालय में आईक्यूएसी सेल (नैक) द्वारा आयोजित एक दिवसीय व्याख्यान के दौरान मुख्य वक्ता इलाहाबाद विश्वविद्यालय के बॉटनी की प्रोफेसर हरवंश कौर केहरी ने कही। व्याख्यान का विषय रोल ऑफ माइक्रोब्स इन सस्टेनेबल एग्रीकल्चर रखा गया था। उन्होंने अपने व्याख्यान में कहा कि आधुनिक कृषि फर्टिलाइजर इनपुट पर आश्रित है जो काफी महंगी भी है। कीटनाशक का प्रयोग पर्यावरण के लिए खतरनाक है। यह इकोलॉजी के लिए भी उपयुक्त नहीं है। कृषि का आधुनिकीकरण होने से उत्पादन तो बढ़ा है लेकिन परम्परागत खेती - किसानी पर प्रभाव पड़ा है। धरल्ले से आज रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग खेतों में किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि केमिकल फर्टिलाइजर की जगह माइक्रोब्स यानी जीवाणु का प्रयोग किये जाने से सस्टेनेबल एग्रीकल्चर को बढ़ावा मिकेगा। घातक रासायनिक उर्वरक के प्रयोग से हमारा पूरा इको सिस्टम खराब हो रहा है। इसकी जगह प्राकृतिक जीवाणु जो मिट्टी और पौधों की जड़ों में रहते हैं इसका प्रयोग करना चाहिए। इसमें भी समान उर्वरा क्षमता होती है। यह पौधों को आवश्यक खनिज और लवण प्रदान कर सकता है। दरअसल यह एक प्राकृतिक समाधान है। जीवाणु युक्त खाद एक बार पौधों में डालने से ही ये पौधों की जड़ों में अपना घर बना लेते हैं। इसे बार - बार डालने की जरूरत भी नहीं पड़ती है। इसलिए इसे हर साल नहीं डाला जाता है। इससे हमारा पारिस्थितिकी भी ठीक रहता है। प्रोफेसर केहरी ने कहा कि वर्तमान परिवेश को देखते हुए मृदा को प्रदूषित होने से बचाना अत्यंत आवश्यक है जिससे मृदा की उर्वरा-शक्ति का नुकसान न हो सके। फसलों का अच्छा उत्पादन करने में जैविक उर्वरकों का प्रयोग लाभदायक सिद्ध हो रहा है। जैविक उर्वरकों का प्रयोग करने से खेती में उपयोग हो रहे अंधाधुंध रासायनिक उर्वरकों की निर्भरता में अवश्य ही कमी आएगी। साथ ही साथ प्रदूषित हो रही मृदा में भी कमी होगी। फसलों से अच्छी गुणवत्ता की अधिक पैदावार लेने के लिए रासायनिक उर्वरकों के साथ-साथ जैविक उर्वरकों के प्रयोग की पर्याप्त संभावनाएं हैं। प्रो. हरवंश कौर केहरी ने जैविक उर्वरक की महत्त्वता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जैविक उर्वरक कम खर्च पर आसानी से उपलब्ध है तथा इनका प्रयोग भी बहुत सुगम है। जैविक उर्वरकों को रासायनिक उर्वरकों के साथ आसानी से प्रयोग किया जा सकता है। जैविक उर्वरक वायुमंडल में उपस्थित नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करके फसलों को उपलब्ध कराते हैं। मृदा में अघुलनशील फास्फोरस को घुलनशील बनाते हैं जिससे अगली फसल को भी लाभ पहुंचता है। जैविक उर्वरकों के प्रयोग से विभिन्न फसलों में 10 से 25 फीसदी तक उपज में वृद्धि होती है। इनके प्रयोग से रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में भी कमी की जा सकती है। जैविक उर्वरक पौधों की जड़ों के आसपास (राजोस्फीयर) वृद्धि कारक हार्मोन उत्पन्न करते हैं जिनसे पौधों की वृद्धि पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। जैविक उर्वरकों का उपयोग पर्यावरण सुरक्षा में सहायक है। किसानों को कृषि लागत में कमी और आर्थिक लाभ में मदद मिलती है। पहले लोग चूल्हे के राख और अपशिष्ट पदार्थों को भी खेतों  में डालते थे ताकि उर्वरा शक्ति बनी रही। उन्होंने कहा कि राइजोबियम सर्वाधिक प्रयोग में आने वाला जैविक उर्वरक है। विभिन्न दलहनी फसलों को नाईट्रोजन उपलब्ध कराने के लिए अलग-अलग तरह के राइजोबियम जीवाणुओं की आवश्यकता होती है। इस प्रजाति के जीवाणु मुख्यतः दाल वाली फसलों में वायुमंडल से नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करते हैं। यह जीवाणु दलहनी फसलों की जड़ों में गांठें बनाते हैं। इन गांठों में राइजोबियम जीवाणु निवास करते हैं। राइजोबियम जीवाणु वायुमंडल में उपस्थित स्वतंत्र नाइट्रोजन को ग्रहण करके दलहनी फसलों को उपलब्ध कराते हैं। तकरीबन दो घंटे तक उन्होंने व्याख्यान दिया। मौके पर शिक्षकों और छात्राओं ने भी प्रो. केहरी से सवाल पूछे। पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन के माध्यम से उन्होंने छात्राओं का मार्गदर्शन किया। इसके पूर्व प्रोफेसर हरवंश कौर केहरी का स्वागत प्राचार्या ने अंग वस्त्र, फूल का पौधा और उपहार भेंट कर किया। प्राचार्या डॉ अर्चना ठाकुर ने स्वागत संबोधन में कहा कि छात्राओं के शैक्षणिक विकास के लिए इस तरह के ज्ञानवर्धक कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित किये जाते रहेंगे। उन्होंने कहा कि व्याख्यान का विषय काफी सामयिक है। कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। नए तकनीकों के प्रयोग के साथ - साथ जैविक खेती को भी बढ़ावा देने की जरूरत है। फसलों में प्रयोग किए जाने वाले रासायनिक उर्वरकों के अनुचित व असंतुलित मात्रा में बिना सूझ-बूझ के प्रयोग में कमी लाने की आवश्यकता है अन्यथा मृदा में उपस्थित लाभकारी जीवाणु और जीव-जंतु विलुप्त हो जाएंगे और इनकी उपस्थिति में मृदा में होने वाली विभिन्न अपघटन तथा विघटन इत्यादि क्रियाओं पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। उन्होंने जीवाणुयुक्त खाद का प्रयोग और परम्परागत खेती को अपनाने पर बल दिया। नैक की कॉर्डिनेटर प्रो. माला सिन्हा ने आईक्यूएसी की गतिविधियों से अवगत कराया। बॉटनी की हेड डॉ शिप्रा राज ने व्याख्यान का विषय प्रवेश किया। वहीं, धन्यवाद ज्ञापन शिक्षक संघ के अध्यक्ष व इतिहास के प्रोफेसर डॉ रमन सिन्हा ने किया। इस मौके पर डॉ रफीकुल हसन, डॉ राजीव सिंह, डॉ मुकेश सिंह, डॉ रीता सिन्हा, डॉ अनुराधा प्रसाद, डॉ अंजू कुमारी, डॉ नीलम, डॉ कुमार प्रभात चन्द्र, डॉ मनोरमा सिंह, डॉ शिप्रा राज, डॉ दीपक कुमार दिनकर, डॉ प्रियंका कुमारी, डॉ पृथा बसु, डॉ सांत्वना, डॉ कोमल कुमारी, डॉ श्वेता राय, डॉ अलोका कुमारी सहित कई विभागों के शिक्षक और बड़ी संख्या में छात्राएं मौजूद थी।
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