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| राजीव कुमार, प्रधान संपादक, ग्राम समाचार |
वास्तविक स्वाधीनता और सुशासन का अनुभव तब तक संभव नहीं है, जब तक जिले का प्रशासनिक प्रमुख स्वयं को एक 'संग्रहकर्ता' की संकीर्ण मानसिकता से मुक्त कर एक संवेदनशील 'जन-समन्वयक' के रूप में स्थापित नहीं करता। इस परिवर्तन के लिए प्रशासन को सत्ता के अहंकार और नियंत्रण वाली कार्यशैली को त्यागकर पारदर्शिता, जवाबदेही और सहयोग के सिद्धांतों को अपनाना होगा।
जब प्रशासनिक ढांचा आदेश देने के बजाय समन्वय करने और जनता की भागीदारी को प्रोत्साहित करने पर केंद्रित होगा, तभी गांधीजी के 'ग्राम स्वराज' की परिकल्पना धरातल पर उतरेगी।
इस व्यवस्था को पूरी तरह से लोकतांत्रिक रंग में ढालने के लिए यह आवश्यक है कि जिला प्रशासन स्थानीय निकायों और आम नागरिकों को अपनी सफलता का भागीदार समझे। 'नियंत्रक' की भूमिका से 'सहयोगकर्ता' की भूमिका में यह बदलाव केवल कार्यशैली का नहीं, बल्कि गहरी वैचारिक प्रतिबद्धता का होना चाहिए।
जब जिले का मुखिया District Collector (D.C.) ग्राम स्वराज के प्रति समर्पित होकर निर्णय प्रक्रिया को विकेंद्रीकृत करेगा और अंतिम व्यक्ति की आवाज़ को मुख्यधारा के विकास से जोड़ेगा, तभी प्रशासनिक मशीनरी अपनी औपनिवेशिक जड़ों को काटकर एक लोक-कल्याणकारी तंत्र के रूप में फल-फूल सकेगी।
अंततः, प्रशासन की सार्थकता राजस्व जुटाने में नहीं, बल्कि जनता के विश्वास और सहयोग को अर्जित करने में ही निहित है।
- राजीव कुमार, प्रधान संपादक, ग्राम समाचार

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