Bhagalpur News:रमज़ान मुबारक में ईद-उल-फितर से पहले सदक़ा-ए-फित्र (फितरा) देने की फ़ज़ीलत और अहमियत


ग्राम समाचार, भागलपुर। खानकाह पीर दमड़िया शाह के सज्जादा नशीन सैयद शाह फ़ख़रे आलम हसन ने शुक्रवार को कहा कि इस्लाम में रमज़ान का महीना बहुत ही बरकत और रहमत वाला महीना है। इस महीने में मुसलमान रोज़ा रखते हैं, इबादत करते हैं और गरीबों की मदद करते हैं। रमज़ान के आख़िर में ईद-उल-फितर से पहले हर मुसलमान पर सदक़ा-ए-फित्र (फितरा) देना वाजिब किया गया है। इसका मक़सद गरीब और ज़रूरतमंद लोगों की मदद करना और रोज़े की कमियों को पूरा करना है।

फितरा देने की अहमियत

सदक़ा-ए-फित्र इस्लाम की एक अहम इबादत है। यह हर मुसलमान मर्द, औरत और बच्चे की तरफ से दिया जाता है। जो व्यक्ति मालदार है, उसके लिए यह जरूरी है कि वह अपने परिवार की तरफ से भी फितरा अदा करे।

हदीस की रोशनी में

हजरत Prophet Muhammad (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया:

“रोज़े की हालत में जो छोटी-मोटी गलतियाँ हो जाती हैं, सदक़ा-ए-फित्र उन्हें पाक कर देता है और गरीबों के लिए खाने का ज़रिया बनता है।” इस हदीस से पता चलता है कि फितरा रोज़े को मुकम्मल और कबूल होने में मदद करता है।

फितरा देने का सही समय

फितरा ईद-उल-फितर की नमाज़ से पहले देना सबसे बेहतर है ताकि गरीब लोग भी ईद की खुशी में शामिल हो सकें। अगर कोई नमाज़ के बाद देता है तो वह सिर्फ साधारण सदक़ा रह जाता है।

फितरा देने का मक़सद

फितरा देने के कई मक़सद हैं:

गरीब और जरूरतमंद लोगों की मदद करना, रोज़े की कमियों को पूरा करना, समाज में बराबरी और भाईचारा बढ़ाना और ईद की खुशी में सभी को शामिल करना।

फितरा किसे दिया जाता है

फितरा गरीब, मिस्कीन और जरूरतमंद लोगों को दिया जाता है ताकि वे भी ईद के दिन खुश रह सकें और खाने-पीने का इंतज़ाम कर सकें।

निष्कर्ष

सदक़ा-ए-फित्र इस्लाम की एक महत्वपूर्ण इबादत है जो रमज़ान के रोज़ों को मुकम्मल करती है और गरीबों की मदद का जरिया बनती है। इसलिए हर मुसलमान को चाहिए कि वह ईद-उल-फितर से पहले अपना फितरा अदा करे ताकि उसकी इबादत मुकम्मल हो और समाज में मोहब्बत और बराबरी का पैगाम फैले। सैय्यद हसन ने कहा कि फरज़ंदान-ए-तौहीद (अल्लाह की एकता को मानने वाले मुसलमानों) ने आज दुनिया भर की मस्जिदों में जुमातुल विदा की नमाज़ पूरे जोश और अकीदत के साथ अदा की। इस मौके पर नमाज़ियों ने अल्लाह तआला से दुनिया में अमन-ओ-सुकून, भाईचारे और सलामती के लिए खास दुआएँ मांगीं। नमाज़ के बाद इमामों और उलमा-ए-कराम ने लोगों को आपसी मोहब्बत, इंसानियत और भलाई के रास्ते पर चलने की नसीहत दी। साथ ही देश की तरक्की, खुशहाली और उन्नति के लिए भी विशेष दुआएँ की गईं। जुमातुल विदा रमज़ानुल मुबारक के आख़िरी जुमे का दिन होता है, जो मुसलमानों के लिए बहुत अहमियत और बरकत वाला माना जाता है। इस दिन बड़ी तादाद में लोग मस्जिदों में इकट्ठा होकर इबादत करते हैं और अल्लाह से अपने गुनाहों की माफी और बेहतर भविष्य की दुआ करते हैं।


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Editor - Bijay shankar

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- राजीव कुमार (Editor-in-Chief)

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