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Bounsi News: मंदार की तराई में अवस्थित मुक्तिधाम में ना तो पेयजल की व्यवस्था, ना ही रोशनी की व्यवस्था, अंतिम संस्कार के लिए आए हुए लोगों को हो रही परेशानी

ग्राम समाचार,बौंसी,बांका। 

वास्तव में भारत की सांस्कृतिक कल्पना में श्मशान सदैव शामिल रहे हैं। राजा हरिश्चंद्र की दानवीरता की कहानी एक श्मशान के इर्द-गिर्द बुनी गयी है जिसमें उन्हें अपना राजपाट छोड़कर एक डोम का काम करना पड़ा था। डोम का काम श्मशान में शवों को जलाना था। इसके कारण डोमों को आरंभिक भारत की सामाजिक संरचना में बहिष्करण का शिकार होना पड़ा। उनके पेशे को हीन पेशा कहा गया था। इसी प्रकार धर्मसूत्रों में स्नातकों के प्रतिदिन के जीवन को निर्धारित करने का प्रयास किया गया था। स्नातकों या द्विजों से अपेक्षा की गई थी वैदिक मंत्रों के पाठ को पवित्र मानते हुए उसका यहां-वहां वाचन न करें। न बाजार में, न श्मशान में वेद का पाठ करना चाहिए। उस गांव में भी वेद पाठ स्थगित कर देना चाहिए जहां कोई शव पड़ा हो या चाण्डाल का घर हो। यदि आप आरंभिक भारत के धर्मशास्त्रों को पढे़ंगे तो पाएंगे कि श्मशान एक ऐसा स्पेस था जो लोगों के जीवन में शामिल होते हुए बहिष्कृत था। श्मशान के इर्द-गिर्द एक कर्मकांडीय अर्थव्यस्था विकसित हुई जिसमें पुरोहित समाज के अंदर था तो शवों को जलाने वाला डोम समाज से बहिष्कृत था। अंग्रेजों के आगमन के 

बाद भारत की रियासतों और ब्रिटिश भारत में जो चकबंदी हुई उसमें यदि किसी गांव के बाहर कोई श्मशान था तो उसे राजस्व के नक़्शे में स्पष्ट रूप से दिखाया जाता था। लेकिन भारत के ज्ञात इतिहास में किसी शासक या सरकार ने हिंदुओं के लिए श्मशान बनाने की बात नहीं की। शायद उन्हें लगता था कि, इससे लोग नाराज हो जाएंगे क्योंकि गांवों की सांस्कृतिक-धार्मिक पारिस्थितिकी में मृतक के अंतिम संस्कार शामिल रहने के बावजूद कोई व्यक्ति मरना नहीं चाहता है। हां, यह बात अवश्य रही कि अलग अलग सरकारों द्वारा तीर्थस्थलों पर बिजली के शवदाह गृह बनाए गए। घाट बनाए गए। इसी क्रम में मंदार की तराई में अवस्थित मुक्तिधाम 2012 में ही बनाए गए थे। परंतु आज के दौर में मुक्तिधाम में ना तो बिजली है और ना ही पानी की व्यवस्था है। इतना ही नहीं बनाया गया मुक्तिधाम पूरी तरह खंडहर में तब्दील हो चुका है। जानकारी हो कि कोरोना काल में यहां अभी रोज करीब दर्जनों शव का अंतिम संस्कार किया जा रहा है। हालांकि बीते 7 दिनों से शव की संख्या घटी है। परंतु प्रशासन के द्वारा यहां पर पेयजल, रोशनी के साथ-साथ किसी भी प्रकार की जमीनी सुविधा नहीं दी गई है। 

जिसके कारण सुदूर क्षेत्र से आए लोगों को अंतिम संस्कार के समय अंधेरे में रात को मोमबत्ती की रोशनी में जहां शवों को जलाना पड़ता है वहीं, पीने के लिए बोतलबंद पानी का सहारा लेने के लिए लोग मजबूर हैं। उन्हें पेयजल के लिए काफी दूर तक भटकना पड़ता है। प्रशासनिक पदाधिकारियों की लापरवाही से मुक्तिधाम खंडहर में तब्दील हो गया। जानकारी हो कि, पीएचडी विभाग के द्वारा लगभग 39 लाख की लागत से 2012 में मंदार की तराई में पापहरणी  सरोवर के किनारे 6 बर्निंग बेड वाला मुक्तिधाम का निर्माण कराया गया था। इसका निर्माण सरकार के द्वारा लोगों की सुविधा एवं पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने के लिए कराया गया था। प्राप्त जानकारी के अनुसार विभाग के द्वारा इसे अंचल कार्यालय के सुपुर्द कर दिया गया था। बताया जाता है कि, मुक्तिधाम के रखरखाव की जिम्मेदारी 

अंचल प्रशासन की होनी थी। परंतु विभाग की लचर पचर व्यवस्था का शिकार मुक्तिधाम शुरुआती दौर से ही खंडहर में तब्दील हो गया। यहां तक की रोशनी के लिए लगे सोलर प्लेट एवं पेयजल के लिए लगे मोटर तक की असामाजिकतत्वों द्वारा चोरी कर ली गई। शव के अंतिम संस्कार में आने वाले लोगों की सुविधा के लिए यहां पर पेयजल की व्यवस्था के साथ-साथ शौचालय, बैठने के लिए शेड भी बनाए गए थे। परंतु ना ही मुक्तिधाम को चालू किया गया और ना ही इसका जीर्णोद्धार किया गया। इसकी वजह से आज भी यह मुक्तिधाम विरान पड़ा हुआ है। जानकारी हो कि, मुक्तिधाम के प्रारंभ हो जाने के बाद विभाग के द्वारा शव जलाने के लिए तयशुदा रकम ली जाती तो इससे सरकार को राजस्व की प्राप्ति होती। इसके आरंभ हो जाने से प्रखंड क्षेत्र के साथ-साथ जिले के लोगों को भी शव जलाने में सुविधा हो जाती। अंचलाधिकारी विजय कुमार गुप्ता ने बताया कि, यह मामला उनके आने के काफी वर्ष पहले का है। मुक्तिधाम हैंड ओवर किया गया है या नहीं इसकी जानकारी उन्हें नहीं है। पड़ताल करने के उपरांत वरीय पदाधिकारियों को इसकी सूचना दी जाएगी। 

कुमार चंदन,ग्राम समाचार संवाददाता,बौंसी।

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Editor - कुमार चन्दन, बाँका (बिहार)

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