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Editorials : बिहार को विशेष प्रोत्साहन की जरूरत



हाल ही में सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था को दिया गया प्रोत्साहन मुख्यतः आपूर्ति पक्षीय प्रबंधन है, जो इस आशा के साथ दिया जाता है कि इससे विकास पटरी पर लौट आयेगा. अगर यह खोखला वादा न होकर वास्तविक भी हो, तब भी इससे अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने वाली पर्याप्त मांग नहीं पैदा हो सकती है.


यहां यह जानना बहुत जरूरी है कि नेहरू के आत्मनिर्भरता के आह्वान और मोदी के आत्मनिर्भर एजेंडे में क्या अंतर है? नेहरू का एजेंडा स्वाधीनता संग्राम के दौर में नीचे से ऊपर की ओर आर्थिक सशक्तीकरण की परिणति थी. इसके विपरीत, मोदी का एजेंडा अधिक व्यक्तिपरक है, जिसमें चुनिंदा उद्योगपति और स्टार्टअप ही शामिल हैं.


इसलिए वर्तमान प्रोत्साहन का यदि कोई लाभ है, तो वह औद्योगिक रूप से उन्नत दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों को ही मिलेगा. यहां यह प्रश्न उठ खड़ा होता है कि इस प्रोत्साहन के लाभ से देश के अन्य क्षेत्रों, खास कर हिंदी हृदय प्रदेश के वंचित रह जाने की आशंका क्यों है?

दो वर्ष पहले झारखंड के वित्त सचिव ने बताया था कि राज्य में मंत्री आमतौर पर संबंधित विभागों के पूरे आवंटन को यथाशीघ्र अपने व्यक्तिगत खातों में हस्तांतरित करने को अधीर रहते हैं. यह भ्रष्ट आचरण है, जो अकेले बिहार और झारखंड तक सीमित नहीं है, वरन हिंदी हृदय प्रदेश के अन्य राज्यों में भी फैला हुआ है. ऐसा भ्रष्ट आचरण मुख्यतः उन्हीं राज्यों तक सीमित है, जहां इस्ट इंडिया कंपनी ने स्थायी बंदोबस्ती की कृषि व्यवस्था लागू की थी. राज्य और रैयतों के बीच बिचौलिये वाली यह व्यवस्था मुख्यतः पूर्वी भारत में लागू थी.

आजादी के बाद से ये राज्य सामान्यतः पर्याप्त विकास दर्ज करने में असफल रहे हैं. इसके विपरीत, रैयतवाड़ी कृषि प्रणाली में, जो मुख्यतः दक्षिणी और पश्चिमी भारत में लागू थी, रैयतों और राज्य के बीच कोई बिचैलिया मौजूद नहीं था. सो आर्थिक विकास के दौर में उन राज्यों ने तेज छलांग लगायी. उन राज्यों में सामंती पकड़ अपेक्षाकृत कमजोर थी, जिससे अधिक सामाजिक आंदोलन की गुंजाइश बनी. इससे कानून को लागू करने वाले नागरिक समाज और उपराष्ट्रीय पहचान के विकास में मदद मिली.

इस प्रकार, उन राज्यों में कृषि अथवा व्यापार के जरिये हुआ धन-संचय उत्पादक निवेश का कारण बना. जैसे आंध्र प्रदेश में कम्मा लोगों ने अपने कृषि अधिशेष का उपयोग पहले तंबाकू में, फिर फिल्मों में और उसके बाद ज्ञानमूलक उद्योग में किया. आरंभ में यह कम्मा लोगों तक ही सीमित था, लेकिन बाद में इसमें रेड्डी या कप्पू जैसी अन्य जातियां भी शामिल हो गयीं. इनमें से कइयों ने जबरदस्त उद्यमिता कौशल दर्शाया. तमिलनाडु के चेट्टियार, नाडार और अन्य जातियों ने व्यापार, वाणिज्य और उद्योग के जरिये उत्पादक निवेश करके पूंजी संचय किया.

कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात में भी यही हुआ. कनार्टक में मैसूर के महाराजा, महाराष्ट्र में लक्ष्मणराव किर्लोस्कर और गुजरात में अंबालाल साराभाई इसके खास प्रतीक थे. रैयतवाड़ी राज्यों ने अपने ढंग से योगदान दिया, जिससे विकास को बढ़ावा मिला और उनकी अपनी संस्थागत दृष्टि बनी. दृष्टि निर्माण के अलावा, उन लोगों ने अपने सामाजिक एजेंडे के मार्गदर्शन के लिए विशेषज्ञों की भी पहचान की. जैसे, एम विश्वेश्वरैया द्वारा तैयार 1925 की पंचवर्षीय योजना को मैसूर के वाडियार वंश का संरक्षण मिला.

वहीं सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय ने भीमराव आंबेडकर को उच्च शिक्षा के लिए कोलंबिया विश्वविद्यालय भेजा. इतना ही नहीं, उन लोगों ने अपनी परियोजनाओं की सफलता सुनिश्चित करने के लिए वित्तीय संस्थानों को भी बढ़ावा दिया. बीपी सीतारमैया ने आंध्र बैंक की, बड़ौदा के महाराजा ने बैंक ऑफ बड़ौदा की और टीएमए पई ने सिंडिकेट बैंक की स्थापना की. उनके संस्थागत प्रवर्तक क्षेत्रीय व्यापार संगठन थे, जिन्होनें अपने वर्गीय हितों को सशक्त ढंग से आगे बढ़ाया.

इसके विपरीत, देश के पूर्वी क्षेत्र में कमजोर शासन था. स्वदेशी आंदोलन को जन्म देने के बावजूद वहां के नागरिक समाज के पास दृष्टि या विकासपरक रणनीति का अभाव था. इस्ट इंडिया कंपनी द्वारा किये गये औद्योगीकरण ने क्षेत्र के देशज उद्यमियों को समाप्त कर दिया था.

हालांकि कुछ लोगों ने उद्यमिता का प्रयास किया था, लेकिन वे असफल ही रहे थे. क्योंकि क्षेत्र में निवेश के लगभग सभी रास्तों पर ब्रितानियों ने कब्जा कर लिया था. आजादी के बाद के दौर में भाड़ा समानीकरण की नीति ने खनिज स्रोतों से संपन्न इस क्षेत्र में औद्योगिक विकास की बची-खुची संभावना भी समाप्त कर दी.

औपनिवेशिक दौर में बिहार, बंगाल प्रांत का पिछला हिस्सा बना हुआ था. यहां सामाजिक आंदोलन का फलक भी सीमित था. लिहाजा, राज्य में सिर्फ दो तरह की पहचान थी. जातीय या राष्ट्रीय. उपराष्ट्रीय पहचान कुल मिला कर अनुपस्थित थी. दक्षिणी और पश्चिमी भारत के सामाजिक आंदोलनों के विपरीत, बिहार का किसान आंदोलन प्रत्यक्षतः स्थायी बंदोबस्ती को समाप्त करने की दिशा में निर्देशित था. बिहार में कभी कोई सार्थक भूमि सुधार भी नहीं दिखा.

आर्थिक रूप से सफल अधिकांश राज्यों ने आजादी के तत्काल बाद भूमि सुधार किया. वहीं बहुजातीय सामाजिक आंदोलन और उपराष्ट्रीयता के अभाव में बिहार में पारंपरिक संभ्रांत लोगों का एकमात्र एजेंडा राजनीतिक प्रभावों का दोहन था. बिहार में अधिकांश विकास कार्य, लागत संबंधी भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबा हुआ था, जिससे यहां संभावित विकास बिल्कुल नहीं हुआ. दूसरे राज्यों में टर्नओवर आधारित भ्रष्टाचार था, लेिकन उसमें विकास कार्य उचित ढंग से पूरा होता था.

उसके बाद राज्यों के कर्मचारी-अधिकारी विकास के प्रत्यक्ष लाभार्थियों से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष भुगतान लेते थे. बिहार में संभ्रांत तबके का निर्माण भी एकांगी था और विकासोन्मुख नागरिक समाज यहां उभर नहीं पाया. जमींदारी उन्मूलन के बाद राजनीतिक संबंधों से लाभ उठाने की यहां के संभ्रांत लोगों की प्रवृत्ति प्रशासनिक अधिकारी बन कर भी जारी रही. बिहार में उन्हीं प्रशासनिक अधिकारियों का नाम श्रद्धा से लिया जाता है, जिन्होंने अपार धनसंचय किया या अपने जाति समूह या क्षेत्र के लोगों को प्रशासनिक व्यवस्था में शामिल करने में सफल रहे.

सौजन्य : प्रभात खबर 
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Editor - MOHIT KUMAR

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- राजीव कुमार (Editor-in-Chief)

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