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Editorials : शांति की दरकार दोनों को है



यह बेहद अफसोस की बात है कि लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (चीन की सेना) की शर्मनाक हरकत में कमांडिंग अफसर सहित हमारे तीन जवान शहीद हो गए। दशकों बाद एलएसी पर ऐसी जानलेवा झड़प हुई है। हाल के वर्षों में दोनों देशों के फौजी सीमा पर धक्का-मुक्की या मारपीट ही करते रहे हैं, क्योंकि उन्हें हथियार न चलाने के निर्देश मिले हुए हैं। भारत और चीन के द्विपक्षीय समझौतों के प्रावधान भी यही हैं कि दोनों देशों के बीच बातचीत का रास्ता हमेशा खुला रहेगा और हिंसक घटनाओं पर लगाम लगाई जाएगी। मगर पिछले कुछ दिनों से लद्दाख में चीनी सेना की तरफ से हिंसक घटनाओं में तेजी आ रही थी। सोमवार-मंगलवार रात की यह घटना उसी हिंसा की अगली कड़ी है। 
सवाल यह है कि हमें चीन के सैनिकों के अतिक्रमण से पीछे हटने और सीमा पर झड़प खत्म होने की गलतफहमी कैसे हो गई? साफ है, ताजा झड़पों को संभालने के निर्देश सैनिकों को अभी तक नहीं मिले हैं। पहले चीन के सैनिक कुछ मीटर तक घुसपैठ किया करते थे, लेकिन अब वे कुछ किलोमीटर तक ऐसा करने लगे हैं। इसकी बड़ी वजह यही है कि मैकमोहन रेखा पर दोनों देशों की अब तक सहमति नहीं बन सकी है। तिब्बत और अरुणाचल प्रदेश के बीच बीजिंग इसे नहीं मानता, जबकि अक्साई चिन को हम अपना हिस्सा मानते हैं। फिर भी, द्विपक्षीय समझौतों के तहत सैनिक सीमा पर हर हाल में शांति बनाकर रखते रहे हैं। भारत और चीन के शीर्ष नेतृत्व यह मानते हैं कि एशिया में दोनों देशों के उभरने की पूरी संभावना है, इसलिए तनातनी से बेहतर है, आपसी रिश्तों को मधुर बनाना। लिहाजा इस जानलेवा टकराव पर चिंता करने के साथ-साथ हमें चिंतन भी करना चाहिए।
चीन की इस नई रणनीति के पीछे कई कारण हो सकते हैं, लेकिन सभी के तार कहीं न कहीं कोरोना वायरस से जुड़े दिखते हैं। दरअसल, महामारी ने चीन की प्रतिष्ठा को काफी चोट पहुंचाई है। एक तरफ पश्चिमी देश कोरोना को ‘वुहान वायरस’ कहने लगे हैं, तो दूसरी तरफ उन राष्ट्रों ने चीन से राहत-पैकेज की मांग की है, जहां ‘बेल्ट रोड इनीशिएटिव’ के तहत विभिन्न परियोजनाओं पर काम चल रहा है। ऐसा इसलिए, क्योंकि उन देशों में कोरोना संक्रमण से जान-माल का अपेक्षाकृत अधिक नुकसान हुआ है। नतीजतन, उन देशों पर चीन का कर्ज बढ़ता चला गया है, और अब वे मुआवजे के लिए चीन पर दबाव बना रहे हैं। चूंकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के कार्यकारी बोर्ड (जिसके मुखिया भारत के स्वास्थ्य मंत्री हैं) ने कोरोना वायरस के जन्म का सच जानने के लिए स्वतंत्र जांच कमेटी बनाई है, इसलिए चीन सीमा-विवाद को हवा देकर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। इसी रणनीति के तहत उसने पाकिस्तान को लगातार उकसाने का काम किया है और इन दिनों नेपाल के नेताओं को अपनी तरफ मिलाने की जुगत में है।
सवाल यह है कि अब हम क्या करें? 1962 की गलतियों का एक सबक यह है कि हम चीन को उसी की भाषा में जवाब दें। हमारे सैनिकों ने लद्दाख की घटना के बाद ऐसा किया भी है। खबर है कि चीन के पांच सैनिक इस झड़प में मारे गए हैं। लेकिन अभी सैन्य टकराव की ओर बढ़ना किसी के लिए भी सुखद नहीं है। अपनी-अपनी क्षमता बढ़ाने की कोशिशें सभी राष्ट्रों की रणनीति का हिस्सा होती हैं। भारत और चीन भी ऐसा करते रहे हैं। भारत की बढ़ती हैसियत के कारण ही चीन ने हमसे कई तरह के तार जोडे़ हैं। फिर चाहे वह रूस के साथ मिलकर त्रिपक्षीय गुट आरआईसी (रूस, भारत और चीन) बनाना हो, या शंघाई सहयोग संगठन में भारत को शामिल करना, या फिर ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका का संगठन) को मूर्त रूप देना। इसलिए अभी भी हमें अपनी क्षमता बढ़ाने पर ही ध्यान देना चाहिए। वास्तविक नियंत्रण रेखा के आसपास बुनियादी ढांचे का जो निर्माण-कार्य चल रहा है, उसे जारी रखना होगा। जरूरत अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने की भी है।
चीन इसलिए भी नाराज है, क्योंकि भारत और अमेरिका हाल के वर्षों में काफी करीब आए हैं। बीजिंग को लगता है कि उसके आंतरिक उथल-पुथल और मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों का भारत फायदा उठाना चाहता है। हमें उसका यह भ्रम दूर करना होगा। उसे यह एहसास दिलाना होगा कि अमेरिका या अन्य देशों से बेहतर संबंध हमारी जरूरत हैं। अपनी ताकत का बेजा इस्तेमाल न करना भारत की बुनियादी रणनीति रही है, और आगे भी वह इसी नीति पर अमल करता रहेगा। मगर इसके साथ-साथ हमारी अन्य जरूरतें भी हैं। एशिया में आतंकवाद का अंत भी ऐसा ही एक काम है। चीन ने कभी मध्य-पूर्व और अफगानिस्तान के आतंकी गुटों से हाथ मिलाकर एशियाई देशों को अस्थिर करने की कोशिश की थी। आज भी वह पाकिस्तान को शह देता रहता है। इसलिए यह लाजिमी है कि हम अपनी ताकत इतनी बढ़ा लें कि चीन की ऐसी हरकतों का मुंहतोड़ जवाब दे सकें या फिर वह ऐसा कोई कदम उठाने की सोच भी न सके। 
श्याम सरन कमेटी ने बताया था कि चीन कई सौ किलोमीटर तक हमारी सीमा में दाखिल हो चुका है। साफ है, शांतिप्रियता को उसने हमारी कमजोरी समझा है, जिसका एक परिणाम 1962 का युद्ध भी है। लेकिन आज का भारत उस दौर से काफी आगे निकल चुका है। हिंसक झड़प होने के बाद भी हमारी मंशा उन समझौतों पर कायम रहने की है, जो द्विपक्षीय या बहुपक्षीय हुए हैं। राजनीतिक और कूटनीतिक तरीके से ही हम ऐसा कर सकेंगे। चीन को यह समझाना होगा कि सीमा पर शांति दोनों देशों के हित में है। भारत और चीन एशिया की दो बड़ी ताकतें हैं, इसलिए अगर वे आपस में उलझेंगी, तो इससे पूरे महाद्वीप में अस्थिरता फैलेगी और इसका नुकसान जाहिर तौर पर दोनों देशों को होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

सौजन्य : हिंदुस्तान 
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Editor - MOHIT KUMAR

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