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Editorials : यदि राज्यों ने कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए सक्रियता नहीं दिखाई तो स्थिति हाथ से फिसल सकती है


कारोबारी गतिविधियों को बल देने का यह मतलब नहीं कि सार्वजनिक स्थलों में फिजिकल डिस्टेंसिंग की जरूरत नहीं रह गई है।
कोरोना मरीजों की बढ़ती संख्या को देखते हुए यह आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है कि संक्रमण फैलने के कारणों का पता लगाकर उनका निवारण प्राथमिकता के आधार पर किया जाए। उम्मीद की जाती है कि प्रधानमंत्री की ओर से कोरोना वायरस से उपजी कोविड-19 महामारी की स्थिति की जो समीक्षा की गई उसके बाद राज्य सरकारें, उनकी विभिन्न एजेंसियां और जिला प्रशासन नए सिरे से चेतेंगे। यदि कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए सक्रियता का परिचय नहीं दिया गया तो स्थिति हाथ से फिसल भी सकती है। यह सामान्य बात नहीं कि बीते कुछ समय से हर चार-पांच दिन में एक लाख कोरोना मरीज बढ़ जा रहे हैं।

यह ठीक है कि भारत में कोरोना वायरस की चपेट में आए लोगों की मृत्यु दर कम है, लेकिन मौत का शिकार बने लोगों की संख्या इतनी भी कम नहीं कि लोग अपेक्षित सावधानी का परिचय देने से इन्कार करें। चिंता की बात यह है कि कोरोना वायरस के संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए आम लोगों को जैसी सावधानी का परिचय देना चाहिए वह नहीं दिया जा रहा है। मास्क का नियमित इस्तेमाल, साफ-सफाई और सेहत के प्रति सतर्कता ही कोरोना संक्रमण से बचे रहने का एक मात्र उपाय है, लेकिन इसके बावजूद यही देखने को मिल रहा है कि लोग लापरवाही बरत रहे हैं।



हद तो यह है कि जिन शहरों और इलाकों में कोरोना मरीजों की अच्छी-खासी संख्या है वहां भी तमाम ऐसे लोग दिख जा रहे हैं जो ढंग से मास्क नहीं लगाते। यह खुद के साथ औरों को खतरे में डालने वाला काम ही है। शायद इसी स्थिति को देखकर प्रधानमंत्री को यह कहना पड़ा कि कोरोना के खिलाफ जागरूकता बढ़ाए जाने की जरूरत है। नि:संदेह यह जागरूकता तभी बढ़ेगी जब जिला प्रशासन लापरवाह लोगों के खिलाफ सख्ती बरतेंगे। ऐसा लगता है कि तमाम लोगों ने यह मान लिया है कि लॉकडाउन से बाहर निकलने के कदम उठाने का यह मतलब है कि सब कुछ पहले जैसे हो गया है।

ऐसा बिल्कुल भी नहीं है और इसका प्रमाण कोरोना मरीजों की तेजी से बढ़ती संख्या के साथ इससे भी मिल रहा है कि कई राज्य सरकारों को लॉकडाउन नए सिरे से लागू करना पड़ रहा है। लॉकडाउन की यह वापसी गंभीर स्थिति की सूचक है। देश के विभिन्न हिस्सों में लॉकडाउन की वापसी कारोबारी गतिविधियों को गति देने की कोशिशों पर पानी फेरने वाली ही है। बेहतर हो कि राज्य सरकारें और विशेषकर उनके जिला प्रशासन यह समझें कि कारोबारी गतिविधियों को बल देने का यह मतलब नहीं कि सार्वजनिक स्थलों में फिजिकल डिस्टेंसिंग की जरूरत नहीं रह गई है।

सौजन्य : दैनिक जागरण 
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Editor - MOHIT KUMAR

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