Godda News: video- ग्राम प्रधानों ने पांचवी अनुसूची क्षेत्र के तहत आदिवासी प्रधानी व्यवस्था के अस्तित्व को बचाए रखने को लेकर की गई बैठक



 
ग्राम समाचार, बोआरीजोर (गोड्डा)। डुमरिया गांव में आदिवासी समाज के संवैधानिक व्यवस्था को अस्तित्व बचाने को लेकर ग्राम प्रधान द्वारा बैठक की गई। बैठक का कार्यक्रम मंगलवार को भू विस्थापित कमेटी के सौजन्य से पूर्व जिला परिषद बबलु हाँसदा के अध्यक्षता में किया गया। यह मामला गोड्डा जिला स्थित बोआरीजोर प्रखंड के अंतर्गत राजमहल परियोजना ललमटिया कोयला खादन द्वारा विस्थापित रैयतों के साथ कानून व्यवस्था को खत्म करने को लेकर मामला प्रकाश में सामने आया हैं।

बैठक में ग्राम प्रधानों ने कहा ईसीएल मैनेजमेंट के द्वारा ग्राम प्रधान व्यवस्था को पारंपरिक ग्राम प्रधान पंचायत गठन के बाद हमारे  अधिकार को दरकिनार करने से अपने आदिवासी के संवैधानिक अस्तित्व को बचाने के लिए बैठक किया गया। बैठक में मुख्य रूप से पुर्व जिला परिषद बबलू हाँसदा,ग्राम प्रधान सुनील हेम्ब्रम एवं भु-विस्थापित कमिटि के अध्यक्ष प्रमोद हेम्ब्रम उपस्थित रहे।
पूर्व जिला परिषद बबलू हाँसदा ने आदिवासी समाज के प्रति अपने बातों को रखते हुए अस्तित्व को बचाए रखने को लेकर कहा कि ग्राम प्रधान, जोगमांझी,पराणीक,गोडेत,नाईकी के बिना आदिवासी समाज नहीं चल सकता है। यह व्यवस्था आदि काल से आदिवासी समाज में चलते आ रहे है। उन्होंने कहा ग्राम प्रधान व्यवस्था के बिना आदिवासी समाज जीवित नहीं रह सकता है। इसके बिना हमारे समाज का अस्तित्व खत्म हो जाएगा इसे बचाना होगा। और इसी को लेकर इस तरह का क्षेत्रों के ग्राम प्रधान व प्रधानी व्यवस्था को लेकर बैठक का कार्यक्रम कर रहे है हम लोगों ने ग्राम प्रधान और बुद्धिजीवियों के बीच में विचार विमर्श करते हुए आगे का रणनीति बनायेंगे। वहीं मौजूद ग्राम प्रधान व आदिवासी समाज के जानकार सुनील हेंब्रम ने कहा हमारे यहां जो आदिवासी के बीच में समाजिक विधि-विधान व्यवस्था है यहां पर मांईस यानी कोयला खादन होने के चलते आदिवासी विस्थापित हो रहे हैं। विस्थापित होने के बाद उसके संस्कृति लुप्त हो जाती है जैसे हम लोगों का संथाल में बंदना होता है। बाहा (नये फुल)पर्व होता है। अदरा(खेती की शुरुआत) पर्व होता है। कराम(नये फसल)पर्व होता है तो करम में फसल का पूजा होता है जब वह आदमी का खेती-बाड़ी ही खत्म हो जाए तो पूजा कहां से करेगा। आज हम लोग बंदना पर्व बंदना पर्व में मवेशियों व नये धान के फसल के त्यौहार मनाते है वह त्यौहार भी लुप्त हो गया तो उसका संस्कृति तो वैसे ही खत्म हो गया। जिसके चलते हम लोगों के समाज में न गांव में प्रधान रहा है और न जोगमांझी रहना चाहता है और न ही किसी भी गांव में ग्राम प्रधान,जोगमांझी,प्राणी गोडेत,नाईकी नहीं रह रहे हैं जिसके चलते हमारे समाज को संचालित करने में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है बहुत से ऐसे गांव में पर्व त्यौहार भी नहीं मना पा रहे हैं जिसके कारण हमारे आदिवासी समाज पीछे की ओर जा रहा है।
मुख्य रूप से मौजूद भू-स्थापित कमेटी के अध्यक्ष प्रमोद हेम्ब्रम ने जानकारी दिया कि ईसीएल प्रबंधक महोदय यानी राजमहल परियोजना द्वारा प्रधानी पट्टा से अब नौकरी नहीं दिया जाएगा जो वह नौकरी गांव में उसे पहले प्रोत्साहन राशि के स्वरूप में दिया जाता था। मुआवजा के अलावा आज उनको बंद कर दिया गया है। जबकि पूर्व में ग्राम प्रधान व्यवस्था को प्रबंधन द्वारा उचित व्यवस्था दिया जा रहा था। उन्होंने यह भी जानकारी देते हुए कहा कि जहां तक पट्टा देने की बात है कि आयुक्त महोदय द्वारा उन्होंने आदेश दिया था कि ईसीएल प्रबंधक महोदय को इसका पुर्व में लिखित आवेदन दिया था। और इसका हमारे पास पेपर भी मौजूद है आयुक्त द्वारा लिखित आवेदन में सूचित किया गया है कि आप जितना आदिवासियों की जमीन को ले रहे हैं उतना पट्टा आदिवासियों को या उस रैयती गांव को आपको देना होगा क्योंकि जो यहां का प्रधानी सिस्टम है जो यह शेड्यूल क्षेत्र यानी अनुसूचित क्षेत्र के अंतर्गत रीड की हड्डी का काम करता है उसके बगैर आदिवासी समाज जिंदा कभी नहीं रह सकता है। यह संविधान के तहत अधिकार दिया गया है इसलिए आज इस बैठक को ताई करेंगे आगे किस तरह किया जाए। साथ ही बैठक के माध्यम से प्रशासन को एवं हमारे जितने जनप्रतिनिधि मंत्री मुख्यमंत्री या किसी भी पद में हो उन लोगों से हम अपेक्षा करते हैं इस बिंदु पर अमल करें हमारे लिए जो कानून बना हुआ है संविधान में मौजूद कानून को रक्षा करने का काम करें नहीं तो हम लोग विलुप्त हो जाएंगे। अभी जिस तरह से परियोजना कर रहे है उन्होंने कहा जिस तरह से परियोजना प्रबंधन की ओर से जानकारी मिला है कि नौकरी बंद कर दिया है यानी प्रधानी सिस्टम को बंद कर दिया। मतलब आप का संवैधानिक कानून जो पेसा एक्ट के तहत वह कानून को धीरे-धीरे खत्म किया जा रहा है और वह कानून सबसे बड़ा आदिवासियों का ढाल के रूप में वह कानून ही है। कानून खत्म करना मतलब हमारे आदिवासी को खत्म करना। इसलिए हम आप सबों से आशा करते हैं कि हमलोग जितने भी जनप्रतिनिधि चाहे वह किसी पार्टी से बिलॉन्ग करता हो या कोई भी पार्टी में हो कृपया करके हमारे आदिवासी समस्या को समझे, और हमारे नहीं बल्कि हम आदिवासी समाज की समस्या है। हमारे शेड्यूल एरिया की समस्या है। आदिवासी मूलवासी की समस्या है। बैठक में सैकड़ों से अभी संख्या में ग्राम प्रधान,जोगमांझी,पराणीक गोडेत,नाईकी इत्यादि आस पास गांव के आदिवासी समुदाय भारी संख्या में मौजूद रहे।
-ग्राम समाचार, बोआरीजोर(गोड्डा)।
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Editor - विलियम मरांड़ी।

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- राजीव कुमार (Editor-in-Chief)

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