Editorials : राम मंदिर की ओर

अयोध्या में राम मंदिर बनाने को लेकर केंद्र सरकार ने एक बड़ी जिम्मेदारी पूरी कर ली है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को राम मंदिर ट्रस्ट के गठन को मंजूरी दे दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में यह जानकारी देते हुए बताया कि ट्रस्ट का नाम ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र’ रखा गया है। विवादमुक्त हुई जगह समेत अयोध्या में सरकार द्वारा अधिगृहीत 67 एकड़ जमीन इस ट्रस्ट को दे दी जाएगी।

1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद जब विवाद बढ़ा तो 1993 में अयोध्या में विवादित स्थल सहित आसपास की करीब 67 एकड़ जमीन का केंद्र सरकार ने अधिग्रहण कर लिया था, तभी से यह जमीन केंद्र के पास थी। केंद्र द्वारा राम मंदिर ट्रस्‍ट को मंजूरी दिए जाने के बाद उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने अयोध्‍या से करीब 22 क‍िमी दूर रौनाही में सुन्‍नी वक्‍फ बोर्ड को 5 एकड़ जमीन देने का ऐलान किया।
गौरतलब है कि नवंबर में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने सर्वसम्मति से दिए अपने ऐतिहासिक फैसले में विवादित जमीन पर रामलला का हक माना और वह जमीन राम मंदिर के लिए दे दी, जबकि मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में ही मस्जिद बनाने के लिए कहीं और जमीन देने का आदेश दिया। इसके साथ ही अदालत ने केंद्र सरकार से कहा कि राम मंदिर निर्माण के लिए तीन महीने के अंदर एक ट्रस्ट बनाया जाए।

अब सरकार ने कोर्ट के आदेश की तामील कर दी है और मंदिर बनाने का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि कुछ उलझनें अब भी सुलझनी बाकी हैं। सरकार ने ट्रस्ट के सदस्यों का नाम अभी नहीं बताया है लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि उसने सोच-समझकर ही इसमें लोगों को रखा होगा। दरअसल, अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के तत्काल बाद जिस तरह वहां के प्रमुख साधु-संतों में टकराव हुआ, जिस तरीके से कई गुटों ने अपनी-अपनी दावेदारी पेश की और आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला, उससे ऐसा लगता है कि मंदिर के साथ अनेक पक्षों की आशाएं जुड़ी हैं और वे ट्रस्ट में अपनी अधिक से अधिक हिस्सेदारी चाहते हैं। देखना यह है कि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र में इन दावेदारियों के बीच कितना संतुलन बन पाया है।

मंदिर निर्माण और बाद में उसके सुचारु संचालन के लिए यह संतुलन बहुत जरूरी है। कुछ उलझनें मुस्लिम पक्ष के साथ भी हैं। फैसले के तुरंत बाद सुन्नी वक्फ बोर्ड के दो सदस्यों ने कहा था कि मस्जिद के लिए अलग से जगह न ली जाए। आज की तारीख में बोर्ड की क्या पोजिशन है, नहीं मालूम। यह भी नहीं पता कि यूपी सरकार ने मस्जिद के लिए जमीन तय करते वक्त मुस्लिम पक्ष की राय ली या नहीं। अच्छा होगा कि यह जगह वहां मस्जिद बनाने वालों को अपने मनमाफिक लगे। सरकार को इस मामले में हर किसी को विश्वास में लेकर चलना चाहिए ताकि लंबे समय से चले आ रहे एक बड़े विवाद का सुखद अंत हो।

सौजन्य - नवभारत टाइम्स ।
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