Editorials : बुनियादी समस्याओं का हो समाधान

रणसिंह मान

केंद्रीय बजट में किसानों को कोई खास राहत न मिलने से अब 20 फरवरी को होने वाले हरियाणा विधानसभा के बजट अधिवेशन में किसानों के मुद्दे जोर-शोर से उठने के आसार हैं। हरियाणा क्षेत्रफल में छोटा राज्य होने के बावजूद देश के अन्न भंडार में योगदान करने वाले राज्यों में अग्रणी है। यहां की अनाज मंडियां दूसरे राज्यों की तुलना में काफी बेहतर स्थिति में हैं। बड़ी मंडियों के अलावा काफी संख्या में खरीद केंद्र भी हैं, लेकिन त्रासदी ये है कि मंडियों में बिचौलियों व घोटालेबाजों ने सेंध लगा ली है। किसानों में असंतोष के कारण विपक्षी दलों तथा किसान संगठनों के निशाने पर आयी हरियाणा सरकार पशोपेश में है। ताजा उदाहरण धान खरीद में घोटाले तथा गन्ने के मूल्य को लेकर है, जो सरकार के गले का फांस बन रहे हैं। इससे पहले खरीफ सीजन में बाजरा व गत वर्ष रबी सीजन में सरसों की खरीद पर सरकार को असहज करने वाले सवाल खड़े हुए थे।
किसानों की माली हालत सुधारने के जो विषय केंद्र सरकार के अधीन हैं, उससे इतर यदि प्रदेश सरकार हरियाणा की मंडी व्यवस्था को भ्रष्टाचार मुक्त करने के कदम उठाए तो किसानों को बड़ी राहत मिल सकती है, पर प्रदेश सरकार इस बारे पूरी तरह उदासीन है। हालांकि धान घोटाले की गूंज के बाद वरिष्ठ अधिकारी पीके दास की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई है, जिसे मंडियों में खरीद को पारदर्शी बनाने के सुझाव देने को कहा है, लेकिन अनिश्चित है कि उनकी सिफारिशों को सरकार मानेगी। पूर्व में जाट आरक्षण आंदोलन बारे प्रकाश सिंह कमेटी की रिपोर्ट का हश्र सूबे के लोग देख चुके हैं। दरअसल, न सरकार और न ही खरीद एजेंसियों ने इस तथ्य का संज्ञान लिया कि हरियाणा में बाहरी राज्यों से लाखों टन धान, बाजरा व सरसों मंडियों में बिक्री के लिए आने का जिम्मेवार कौन है व इस धंधे से कौन चांदी कूट रहा है।
भाजपा-जजपा सरकार में कृषि मंत्री जेपी दलाल की जगह ओपी धनखड़ किसानों की खुशहाली की नई थ्योरी रख रहे हैं। उनका कहना है कि किसान अपनी फसल की मार्केटिंग खुद करें तो उनकी किस्मत चमक सकती है। यह कतई व्यावहारिक नहीं, बल्कि केवल मृगतृष्णा है। शायद यह विचार किसान संगठनों के मंच से आया वो नारा है जो बार-बार दोहराया जाता है कि किसान को छोड़कर अन्य सभी को अपनी उत्पाद की कीमत तय करने का अधिकार है तो किसान को क्यों नहीं? यह समझना जरूरी है कि औद्योगिक उत्पाद, जिसमें अनाज जन्य खाद्य सामग्री भी है तथा कृषि उत्पाद की कीमतों के निर्धारण का पैमाना अलग-अलग है। औद्योगिक उत्पाद की कीमतें बाजार की मांग व उपलब्धता पर टिकी हैं, जबकि कृषि उत्पाद का बाजार की मांग से वैसा संबंध नहीं है। किसान के लिए कृषि उत्पाद उसकी आजीविका से जुड़ा है। कृषि उत्पाद में करोड़ों की संख्या में लोग जुड़े हुए हैं तो किसानों की इतनी बड़ी संख्या का मार्केटिंग करना संंभव नहीं है। ऐसे में केवल सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य ही किसान की आय सुनिश्चित करता है। फसलों का विविधीकरण एक अच्छा विचार अवश्य है।
दरअसल, नहीं लगता कि सरकार को यह आभास है कि आवारा पशुओं की बढ़ती संख्या से फसलों को कितना भारी नुकसान हो रहा है। किसान पीढ़ी -दर-पीढ़ी बैलों के सहारे खेती करते आए हैं। एक समय था जब गाय के बगैर किसान का रहना दुश्वार था। किसान के मन में गाय के प्रति सम्मान व भावनात्मक लगाव को भाजपा ने अपनी राजनीति के लिए भुनाया व नया सख्त गो संरक्षण कानून भी बनाया। नई गोशालाएं भी खोली गईं लेकिन रखरखाव के अभाव में वे अपना दायित्व नहीं निभा पाईं। आज प्रदेश की सड़कें, बाजार व खेत आवारा पशुओं से अटे पड़े हैं। खेती में मशीनरी के इस्तेमाल ने बैलों पर निर्भरता खत्म कर दी है। बछड़ों की नई नस्ल आज खेती पर बुरी आफत है।
धान उत्तर प्रदेश व बिहार से तथा बाजरा व सरसों राजस्थान से बड़े पैमाने पर हरियाणा की मंडियों में बिक्री के लिए आता है, जिसके चलते प्रदेश में अनाज माफिया भी खड़ा हो गया है। मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को स्वयं उत्तर प्रदेश व राजस्थान सरकार से अविलंब इस बाबत बात करनी चाहिए। हरियाणा में अनाज भंडारण की व्यवस्था भी जरूरत के मुताबिक नहीं है, जिससे खरीद के बाद बारिश से काफी अनाज खराब होता है। मंडी व्यवस्था में जहां सुधार की जरूरत है, वहीं भंडारण की समस्या से निजात पाना भी जरूरी है। अनाज मंडियों के साथ लगते गांवों में किसानों को भंडारण के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जिससे किसान पुत्रों को रोजगार के अवसर भी मिल सके। खरीद के बाद उठान व बारदाना की समस्या भी किसानों की परेशानी का सबब है। केंद्र या राज्य सरकारें किसानों को राहत पहुंचाने वाली कोई योजना लाती भी हैं तो उसके क्रियान्वयन की जटिलता किसानों की समझ से बाहर है। अत: फसलों का पंजीकरण, नमी का निर्धारण, फसल बीमा, गुणवत्ता के मापदंड, खरीद की शर्तें व गेट पास की व्यवस्था आदि का सरलीकरण किया जाना आवश्यक है।




सौजन्य -दैनिक ट्रिब्यून। ।
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