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Editorials : कोविड टीके की दौड़ में सजग रहे सरकार



भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने गत 2 जुलाई को सबको अचरज में डाल दिया। संस्था के महानिदेशक ने भारत बायोटेक इंटरनैशनल (बीबीआईएल) द्वारा विकसित कोविड-19 टीके पर शुरुआती परीक्षणों के सिलसिले में देश के 12 अस्पतालों को लिखे अपने पत्र में कहा, 'सभी क्लिनिकल परीक्षण पूरा होने के बाद इस टीके को 15 अगस्त, 2020 तक उतारने की परिकल्पना की गई है। बीबीआईएल इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है लेकिन अंतिम नतीजा इस परियोजना में शामिल सभी क्लिनिकल परीक्षण स्थलों के सहयोग पर ही निर्भर करेगा।'
सोशल मीडिया पर खूब चर्चा में रहे इस पत्र की अंतिम पंक्तियों में एक चेतावनी भी निहित थी। उनमें कहा गया था, 'कृपया ध्यान रखें कि इसका पालन नहीं करने को बेहद गंभीरता से लिया जाएगा। इसलिए आपको यह सलाह दी जाती है कि इस परियोजना को सर्वोच्च प्राथमिकता दें और कोई चूक न करते हुए दी गई समयसीमा का पालन करें।'


इस पर चिकित्सा जगत और टीकों के विकास से जुड़े रहे शोधकर्ताओं की प्रतिक्रिया अपेक्षा के अनुरूप ही काफी सख्त रही। इसकी वजह से आईसीएमआर को अब स्पष्टीकरण जारी कर यह कहना पड़ा है कि कोविड-19 के टीके की समयसीमा तय करने का मकसद सिर्फ प्रक्रियागत तेजी लाना एवं लालफीताशाही की अड़चनों को दूर करना था। टीका उतारने का मतलब शायद यह नहीं था कि यह इस्तेमाल के लिए उपलब्ध ही हो जाएगा।

भारत टीकों को जल्द उतारने में तेजी लाने की कोशिश करने वाला पहला देश नहीं है। 'द वाशिंगटन पोस्ट' में गत 1 मई को प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में माइकल जे रोजनवाल्ड ने अमेरिका की संघीय सरकार द्वारा 'ऑपरेशन वार्प स्पीड' चलाने की जानकारी दी थी। यह अभियान कोविड-19 का टीका जनवरी 2021 तक तैयार करने के मकसद से चलाया गया है। अगर ऐसा होता है तो वह टीका तैयार होने में लगने वाले मानक समय से काफी कम होगा। रोजनवाल्ड ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा है कि जल्दबाजी में टीका तैयार करने की पिछली कोशिश बुरी तरह नाकाम रही थी। उनका इशारा स्वाइन फ्लू के टीके के लिए 1976 में गेराल्ड फोर्ड सरकार द्वारा चलाए गए विकास कार्यक्रम की तरफ था।

फरवरी 1976 में यह पाया गया कि फोर्ट डिक्स में तैनात जवानों से लिए गए नमूनों से स्वाइन फ्लू वायरस के दो एकक थे और यह 1918 में कहर बरपाने वाली महामारी स्पैनिश फ्लू वायरस की नस्ल से मेल खाता है। इसके बाद स्वास्थ्य जगत में काफी हंगामा खड़ा हो गया और कई दशकों से कोई महामारी नहीं आने से इसके दस्तक देने की आशंका ने भी स्थिति को गंभीर करने का काम किया। उसमें भी यह संकट उस समय आया जब अमेरिका में उसी साल राष्ट्रपति चुनाव होने वाले थे। टीकाकरण संबंधी सलाहकार समिति ने 10 मार्च को यह निष्कर्ष निकाला था कि महामारी आ सकती है, लिहाजा एक प्रतिरक्षीकरण कार्यक्रम चलाने का सुझाव दिया। बीमारी नियंत्रण केंद्र (सीडीसी) के निदेशक ने एक कदम आगे बढ़ाते हुए व्यापक स्तर पर टीकाकरण को जरूरी बताया।

ऐसी स्थिति में अमेरिकी राष्ट्रपति ने बड़े वैज्ञानिकों की एक बैठक बुलाई जिसमें पोलियो वैक्सीन के लिए मशहूर जोनस साल्क और अल्बर्ट सेबिन भी मौजूद थे। इस तरह राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम की संकल्पना बनी। अमेरिकी संसद कांग्रेस की विनियोग पर गठित चार समितियों ने इस कार्यक्रम को मंजूरी दी और विनियोग विधेयक को भी स्वीकृति मिल गई। राष्ट्रपति फोर्ड ने 24 मार्च,1976 को इस टीकाकरण कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए कहा, 'मैं साफ तौर पर यह कहना चाहता हूं कि फिलहाल हमें इस खतरे की गंभीरता का कोई अंदाजा नहीं है। फिर भी हम देशवासियों की सेहत को लेकर कोई मौका नहीं ले सकते हैं।'

उस समय यह सुझाव भी आया था कि टीके के प्रतिकूल असर संबंधी दावों पर मुआवजे का भी कुछ प्रावधान होना चाहिए लेकिन सर्जन जनरल के कार्यालय ने इसे ठुकरा दिया था। लेकिन बाद में यह उस समय मुद्दा बना जब टीका बनाने वाली कंपनियों ने मुकदमेबाजी से बचाव की गुहार लगाई। लेकिन फोर्ड पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। उनकी योजना तो सर्दियां आने तक रोजाना 10 लाख लोगों को टीका लगाने की थी। सीडीसी में राष्ट्रीय इन्फ्लूएंजा टीकाकरण कार्यक्रम इकाई गठित की गई और संघीय सरकार एवं राज्यों द्वारा संयुक्त रूप से टीकाकरण किया जाना था। टीका बनाने वाली कंपनियों ने अक्टूबर के अंत तक टीका बना लिया और कार्यक्रम के पहले 10 हफ्तों में 4.5 करोड़ लोगों को टीके लगा जा चुके थे।

उसी समय आपदा ने दस्तक दे दी। यह देखा गया कि टीका लगवा चुके लोगों में से करीब 1 लाख लोगों में न्यूरोलॉजिकल समस्या गिलेन-बेयर सिन्ड्रोम के लक्षण दिखाई देने लगे। इस बीमारी से प्रभावित लोगों की बाह्य स्नायु प्रणाली पर असर पड़ा और उन्हें सनसनी एवं झनझनाहट का अहसास होने के अलावा नसों में कमजोरी भी हो रही थी। इसका नतीजा यह हुआ कि पीडि़तों को सांस लेने में तकलीफ और लकवा भी होने लगा। कोविड-19 महामारी में जिस तरह 'साइटोकाइन स्टॉर्म' एक युवा एवं मजबूत रोगी की भी जान ले सकता है, यह स्नायुओं को प्रभावित करने वाली स्वत: प्रतिरक्षित प्रतिक्रिया है। नतीजा यह हुआ कि दिसंबर 1976 आते-आते लकवा के शिकार होने के 94 मामले सामने आ चुके थे और 16 दिसंबर को इस टीकाकरण कार्यक्रम को पूरी तरह बंद कर दिया गया। फिर ऐसे आरोप लगने अपरिहार्य ही थे कि इस कार्यक्रम को महज राजनीतिक लाभ के लिए शुरू किया गया था। 20 दिसंबर, 1976 को 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' ने स्वाइन फ्लू नाकामी के लिए 'सरकार की स्वास्थ्य अफसरशाही के अपने हितों' को जिम्मेदार ठहराया।

टीकाकरण कार्यक्रम की नाकामी और उससे भी बढ़कर महामारी की नाकामी का अमेरिका में दीर्घकालिक प्रभाव रहा था। रेबेका क्रेस्टन ने 'डिस्कवर' पत्रिका में 30 सितंबर, 2013 को लिखा था 'टीकों, खासकर फ्लू के टीके को अपनाने में अमेरिकी जनता के एक तबके की हिचकिचाहट के लिए स्वाइन फ्लू वायरस के खिलाफ जन टीकाकरण के नाकाम राजनीतिक अभियान को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। सरकार की अगुआई वाले अभियान को व्यापक रूप से असफल माना गया और इसने भविष्य के जन स्वास्थ्य अभियानों को अपूरणीय क्षति पहुंचाई। इसके अलावा इस नाकाम अभियान ने फ्लू एवं इसके टीके दोनों के बारे में जन धारणा को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया।'

1976 का यह प्रकरण केवल अकेला वाकया नहीं था। इसके पहले 1955 में भी कटर लैबोरेटरीज के बनाए पोलियो टीके के कुछ बैच में जिंदा वायरस मौजूद थे। इसकी वजह से करीब 40 हजार बच्चों में पोलियो के हल्के लक्षण देखे गए जबकि 51 विकलांग हो गए और पांच बच्चों की तो मौत हो गई थी। 1955 से लेकर 1963 तक सिमियन वायरस एसवी-40 का इस्तेमाल पोलियो टीके बनाने के लिए होता था लेकिन इसमें मिलावट पाई गई। इसी तरह नवजात बच्चों में अपच के लिए जिम्मेदार रोटावायरस के टीके की वजह से 1998-99 में पेट की गड़बड़ी होने की शिकायतें मिलने के बाद उसे वापस ले लिया गया। वर्ष 2007 में एक तरह के फ्लू हिब के लिए तैयार टीके की 12 लाख खुराक को मिलावट की आशंका के चलते बाजार से हटा लिया गया।

हालांकि कोविड-19 टीके के विकास की कोशिश पूरी तरह 1976 की अमेरिकी नाकामी जैसी नहीं है। उस समय ऐसी समस्या थी जो महामारी नहीं बन पाई। लेकिन आज महामारी लगातार अपने पैर पसारती जा रही है और हमारे पास वक्त कम पड़ता जा रहा है। फिर भी इतिहास इतना तो जरूर बताता है कि असरदार टीकों में भी वक्त के साथ अनजान दुष्प्रभाव देखे जा सकते हैं। इस तरह, तमाम मानव प्रयासों की तरह विवेक का दामन थामे रहना बेहतर है।
(लेखक देश के पूर्व कैबिनेट सचिव हैं)

सौजन्य : बिज़नेस स्टैण्डर्ड 

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Editor - MOHIT KUMAR

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