ग्राम समाचार,भागलपुर। नवगछिया अनुमंडल के कोसी तटीय गुवारीडीह बहियार में मध्य युगीन सभ्यता से भी पुरानी सभ्यता के अवशेष मिले हैं। उक्त स्थल बिहपुर प्रखंड अंतर्गत जयरामपुर गांव से करीब 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां पुराने अवशेषों का मिलना इलाके में कौतूहल का विषय है.।अब तक मिले अवशेषों को जय रामपुर गांव के ग्रामीण अविनाश कुमार चौधरी ने सहेज कर रखा है। मिले अवशेषों के मद्देनजर ग्रामीणों ने एक बैठक कर निर्णय लिया है कि वे लोग इसकी सूचना सरकार और प्रशासनिक पदाधिकारियों को देंगे और वे लोग खुद भी उक्त स्थल पर जाकर खुदाई करेंगे।
पुराने अवशेषों में सबसे महत्वपूर्ण एक सिक्का है जो कि आयताकार है। इस सिक्के पर एक घोड़े पर एक योद्धा को दिखाया गया है जो पूरी तरह से राजशाही परिधान में है। सिक्का तांबे का बना हुआ है। ग्रामीणों ने बताया कि एक घड़े में बंद 100 से भी अधिक सिक्के उक्त स्थल से मिले हैं लेकिन जिन लोगों को वह सिक्का मिला उन लोगों ने उसे दबा दिया। अविनाश कुमार चौधरी के पास फिलहाल एक सिक्का मौजूद है। बरामद अन्य सामग्रियों में मिट्टी का चूल्हा, मसाला पीसने के उपयोग में आने वाला पत्थर का सिल्ला लोढ़ी, मिट्टी के कई तरह के बर्तन, पत्थर के कई तरह के सामान, लगभग 10 फीट लंबा और 1 फीट चौड़ा ईंट, मिट्टी का चूल्हा और कोयला आदि सामान भी बरामद हुए हैं।
जयरामपुर गांव के बूढ़े बुजुर्गों का कहना है कि बरामद सामान कम से कम 3 से 4000 वर्ष पुराना है। ग्रामीण इसके पीछे तर्क देते हैं कि बूढ़े बुजुर्ग कहते हैं कि जयरामपुर गांव का अस्तित्व करीब 2000 साल पुराना है लेकिन 2000 वर्षों से यह सभ्यता मिट्टी के अंदर में दबी है और किसी को कुछ भी जानकारी नहीं है। इस हिसाब से उक्त जगह पर जब कभी सभ्यता रही होगी तो वह समय 3 से 4000 वर्ष पुराना होगा। अवशेषों को संरक्षित कर खुदाई करने की इच्छा रखने वाले ग्रामीण अविनाश कुमार चौधरी ने कहा कि पहले भी उक्त स्थल पर कई तरह की सामग्री लोगों को मिलते रहे हैं। 2 दिन पहले जब वे अपने खेत पर गए तो उन्होंने देखा कि कोसी नदी के कटाव में गुवारीडीह का टीला कट रहा था और उससे कई तरह की सामग्री नदी में जल विलीन होने के कगार पर थी। उन्होंने सभी सामग्रियों को बारीकी से एकत्रित किया और उसे लेकर घर चले आए। अविनाश कहते हैं कि गुवारीडीह का टीला एक बड़े भूभाग में फैला था लेकिन कोसी कटाव में यह अब महज 4 एकड़ का रह गया है। इतने भूभाग में अभी भी जंगल है और विगत वर्षों भी कई कुएं के कटाव हो जाने की घटना सामने आयी है। अविनाश का कहना है कि वह पुरातत्व में दिलचस्पी रखते हैं और उनके हिसाब से उक्त जगह की सभ्यता कम से कम 4000 वर्ष पुरानी है। जयरामपुर गांव के बुरे बुजुर्गों का कहना है कि करीब 50 वर्ष पहले कई बार सरकार ने गुवारीडीह की खोदाई करने का मन बनाय। स्थल पर पुरातत्व विभाग की टीम भी पहुंची। लेकिन गुवारीडीह पर पूरी तरह से जंगल था और वहां एक कामा देवी का मंदिर हुआ करता था। लोगों की मान्यता थी कि कमादेवी ही ग्राम देवी हैं और वह गांव की रक्षा करती है इसलिए किसी भी सूरत में हुए लोग जंगल को हटाने नहीं देंगे। चुकी गुवारीडीह की जमीन खतियानी और निजी जमीन है, इसी कारण ग्रामीण पुरातत्व विभाग की टीम को बैरंग लौटा देते थे। पिछले दिनों कामा देवी का मंदिर कोसी कटाव में जल विलीन हो गया। तब जाकर ग्रामीणों ने जंगल को हटाना शुरू किया है और दूसरी तरफ गुवारीडीह कोसी कटाव के एकदम मुहाने पर पहुंच चुका है। ग्रामीणों की इच्छा है कि एक बार सरकार पुरातत्व विभाग के द्वारा उक्त स्थल की सघन खुदाई करें। जिससे उक्त सभ्यता का रहस्योद्घाटन हो सके।
-बिजय शंकर, ग्राम समाचार भागलपुर(बिहार)।


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