Rewari News :: मदर्स डे पर विशेष :: मां भारतीय संस्कृति, संवेदना और संस्कारों की दिव्य चेतना का आधार :: मुकेश कुमार

मां केवल एक संबोधन नहीं, अपितु सृष्टि की वह दिव्य अनुभूति है जिसमें वात्सल्य, करुणा, ममता, त्याग, तपस्या और असीम समर्पण का अथाह सागर समाहित होता है। मां वह पावन शक्ति है, जिसकी गोद में मानव जीवन प्रथम संस्कार प्राप्त करता है तथा जिसके आंचल की छाया में व्यक्ति प्रेम, नैतिकता, संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों का पाठ सीखता है। भारतीय संस्कृति में मां को साक्षात देवी स्वरूप माना गया है और “मातृ देवो भव:” का सनातन संदेश हमारी सभ्यता की आत्मा रहा है।

भारत स्वाभिमान ट्रस्ट रेवाड़ी के जिला प्रभारी एवं समाजसेवी मुकेश कुमार ने मां के गौरव एवं महत्व पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मां का व्यक्तित्व त्याग, धैर्य, सहनशीलता और निस्वार्थ प्रेम की अनुपम प्रतिमूर्ति है। मां स्वयं कष्ट सहकर भी अपनी संतान के जीवन को सुख, समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य से आलोकित करने का सतत प्रयास करती है। उसका संपूर्ण जीवन परिवार की खुशियों, संस्कारों और सामाजिक मर्यादाओं की रक्षा में समर्पित रहता है। उन्होंने कहा कि मां वह पावन वटवृक्ष है जिसकी छाया में परिवार रूपी उपवन सदैव हरा-भरा बना रहता है। मां की प्रार्थनाएं संतान के जीवन की सबसे बड़ी सुरक्षा कवच होती हैं तथा उसका आशीर्वाद व्यक्ति को संघर्षों के अंधकार में भी आशा और प्रकाश का मार्ग दिखाता है। संसार में यदि कोई रिश्ता पूर्णतः निस्वार्थ और पवित्र है तो वह केवल मां का प्रेम है।

जिला प्रभारी ने कहा कि आधुनिक भौतिकतावादी जीवनशैली और भागदौड़ के इस युग में पारिवारिक मूल्यों एवं आत्मीय संबंधों में निरंतर कमी देखी जा रही है। अनेक स्थानों पर माता-पिता विशेषकर वृद्ध माताओं की उपेक्षा समाज के लिए अत्यंत पीड़ादायक एवं चिंतनीय विषय बनती जा रही है। यह हमारी सांस्कृतिक चेतना और मानवीय संवेदनाओं के क्षरण का संकेत है। उन्होंने कहा कि जिस मां ने अपनी इच्छाओं का त्याग कर संतान के जीवन को संवारने में स्वयं को समर्पित कर दिया, वृद्धावस्था में वही मां सम्मान, स्नेह और सहारे की सबसे बड़ी अधिकारी होती है।

उन्होंने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि वे पाश्चात्य संस्कृति से दूर रहकर भारतीय संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों और नैतिक आदर्शों को अपने जीवन में आत्मसात करें। माता-पिता विशेषकर मां के प्रति आदर, सेवा और कृतज्ञता की भावना को जीवन का सर्वोच्च संस्कार बनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। मां की सेवा केवल सामाजिक उत्तरदायित्व नहीं बल्कि आध्यात्मिक साधना और मानव जीवन का सर्वोच्च पुण्य है। समाजसेवी ने कहा कि जिस घर में मां का सम्मान होता है वहां प्रेम, शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। मां परिवार की आत्मा, संस्कारों की धुरी और जीवन मूल्यों की प्रथम पाठशाला होती है। उसकी मुस्कान घर को स्वर्ग समान बना देती है तथा उसकी आंखों का आशीर्वाद संतान के जीवन को सफलता और सौभाग्य से परिपूर्ण कर देता है।

उन्होंने आगे कहा कि समाज में पारिवारिक सौहार्द, मानवीय संवेदनाओं और सांस्कृतिक मूल्यों को सुदृढ़ करने के लिए आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी मां के प्रति श्रद्धा, सम्मान और आत्मीयता का भाव विकसित करे। हमें अपने व्यस्त जीवन से समय निकालकर मां की भावनाओं को समझना चाहिए, उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए तथा उनके जीवन को सुख, सम्मान और आत्मीयता से परिपूर्ण बनाने का प्रयास करना चाहिए। अंत में मुकेश कुमार ने समस्त नागरिकों से भावपूर्ण अपील करते हुए कहा कि मां के चरणों में ही सच्चा स्वर्ग निहित है। मां का आशीर्वाद जीवन की सबसे अमूल्य निधि और सबसे बड़ा संबल है। हमें अपने जीवन में ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिससे मां का हृदय आहत हो। मां की सेवा, सम्मान और स्नेह ही भारतीय संस्कृति की वास्तविक आत्मा तथा मानवता का सर्वोच्च आदर्श है।

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Editor - राजेश शर्मा : रेवाड़ी (हरियाणा)

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- राजीव कुमार (Editor-in-Chief)

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