Bounsi News: जीवित्पुत्रिका व्रत का महत्व जुड़ा हुआ है महाभारत काल से

ग्राम समाचार,बौंसी,बांका। 

जीवित्पुत्रिका व्रत यानि जितिया को महिलाओं के सबसे कठिन व्रतो में शामिल किया जाता है। छठ की तरह तीन दिनों तक चलने वाला यह व्रत बच्चों की लंबी उम्र और संपन्नता के लिए रखा जाता है। इस व्रत में निर्जला यानि बिना पानी के पूरे दिन उपवास किया जाता है। हिंदु पंचांग के अनुसार जितिया का पावन पर्व आश्विन मास में कृष्ण पक्ष के सातवें से नौवें चंद्र दिवस तक मनाया जाता है। इस पर्व की धूम उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में अधिक देखने को मिलती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस व्रत का महत्व महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। इसी कड़ी में बौंसी प्रखंड क्षेत्र में  मंगलवार को  जीवित्पुत्रिका व्रत मताएं रखी है। यह व्रत नहाय-खाय के साथ सोमवार से शुरू हो गया है। जीवित्पुत्रिका व्रत अष्टमी तिथि को रखा जाता है. इसे जिउतिया या जितिया व्रत भी कहा जाता है. जीवित्पुत्रिका व्रत माताएं अपने बच्चों के लिए रखती है। इस दिन माताएं पुत्र ​की दीर्घ, आरोग्य और सुखमयी जीवन के लिए व्रत रखती हैं। यह पर्व तीन दिन तक मनाया जाता है। सप्तमी तिथि को नहाय-खाय के बाद अष्टमी तिथि को महिलाएं बच्चों की समृद्धि और उन्नत के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। इसके बाद नवमी तिथि यानी अगले दिन व्रत का पारण किया जाता है यानी व्रत खोला जाता है। यह व्रत निर्जला रखना पड़ता है।
 

जितिया का महत्व:-

छठ की तरह जीवित्पुत्रिका व्रत यानि जितिया को महिलाओं के सबसे कठिन व्रतो में से एक माना जाता है। इस दिन माताएं अपने संतान की लंबी उम्र व सुख शांति की प्राप्ति के लिए निर्जला व्रत करती हैं। व्रत की शुरुआत सप्तमी तिथि से नहाए खाए से होती है। इस दिन महिलाएं सूर्योदय से पहले स्नान कर व्रत का संकल्प लेती हैं। आपको बता दें छठ की तरह इस दिन भी केवल एक बार ही भोजन किया जाता है। तथा अष्टमी के दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं और नवमी के दिन सूर्यदेव को अर्घ्य देकर पारण किया जाता है।

महाभारत काल से जुड़ी कथा:- 

पौराणिक ग्रंथों में इस व्रत का महत्व महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत युद्ध के दौरान चारो तरफ यह खबर फैल गई की अश्वथामा मारा गया, यह सुनकर अश्वथामा के पिता द्रोणाचार्य ने पुत्र शोक में अपने अस्त्र डाल दिए, तब द्रोपदी के भाई ने उनका वध कर दिया। पिता की मृत्यु के बाद अश्वथामा के मन में प्रतिशोध की ज्वाला भभक रही थी। अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए वह रात के अंधेरे में पांडवो के शिविर जा पहुंचा और उसने पांच लोगों का वध कर दिया, लेकिन पांडव जिंदा थे। परिणामस्वरूप पांडवो को अत्यधिक क्रोध आ गया और अर्जुन ने अश्वथामा से उसकी मणि छीन ली। जिससे अश्वथामा पांडवों से अत्यधिक क्रोधित हो गया और इसका बदला लेने के लिए उसने अभिमन्यू की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चे को मारने का षडयंत्र रच डाला। उसने उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चे को मारने के लिए ब्रम्हास्त्र का प्रयोग किया। भगवान श्रीकृष्ण इस बात से भलीभांति परिचित थे कि ब्रम्हास्त्र को रोक पाना असंभव होगा। ऐसे में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सभी पुण्यो का फल उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चे को दे दिया। जिसके फलस्वरूप उत्तरा के गर्भ में पल रहा बच्चा पुनर्जीवित हो गया। भगवान श्रीकृष्ण के पुण्य प्रताप से उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चे के पुनर्जीवित हो जाने के कारण इस व्रत का नाम जीवित्पुत्रिका व्रत पड़ा।

कुमार चंदन,ग्राम समाचार संवाददाता,बौंसी।

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Editor - कुमार चन्दन, बाँका (बिहार)

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