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Delhi News: आदिवासी संस्कृति को बचाना कई चुनौतीयांं - डॉ०चार्ल्स मरांडी

ग्राम समाचार, दिल्ली। आज 9 अगस्त 2020 पूरे विश्व में आदिवासी दिवस मनाया जा रहा है। विश्व में वैश्विक महामारी फैली हुई है फिर भी एक सांकेतिक तौर पर विश्व आदिवासी दिवस अवश्य मनाए जाने की कामना करता हूँ एवं इस अवसर पर विश्व के सभी आदिवासी लोगों को हार्दिक बधाइयाँ।

विश्व आदिवासी दिवस हमें वर्तमान में भारत देश के आदिवासी लोगों के समक्ष महत्वपूर्ण चुनौतियों पर गहन चिंतन करने के लिए प्रेरित करती है। यदि हम झारखंड के संदर्भ में सोचें तो यह निश्चित तौर से दिखता है कि झारखंड में खनिज खनन, बड़े डैम,बड़ी परियोजनाएं इत्यादियों से आदिवासी लोगों को अपनी ही जमीन से बेदखल किया गया है। परिणामस्वरूप उनके जिंदगी में नकारात्मक प्रभाव ज्यादा पड़ा है। खेत खलिहान खत्म हो गए। परिवार के अंदर अशांति फैली है। समाज में पूर्व में कायम सौहार्द की भावना कम हुई है तथा मतभेद बढ़े हैं।विभिन्न तरह के प्रदूषण फैले हैं। जमीन के अंदर का जल स्तर नीचे चला गया है। पीने के लिए सुद्ध जल उपलब्ध नहीं है। जहाँ बड़ी परियोजनाएं के कारण वहाँ के आदिवासी लोगों को विस्थापित किया गया है वहाँ परियोनाओं द्वारा किया गया सामाजिक जिम्मेवारियों को संतोषजनक नहीं निभाया गया है। परियोनाओं में कार्यरत आदिवासी लोग महाजन के चंगुल में फंसे हैं। उनका बैंक खाता तक महाजनों ने कब्जा कर रखा है। राजनीतिक प्रतिनिधियों की भी इन मामलों में मुखर एवं प्रभावसाली कार्य नजर नहीं आती है। यदि हम राजमहल कोयला परियोजना की बात करें तो यहाँ भी आदिवासी लोगों के लिए संतोषजनक काम नजर नहीं आता है । परियोजना क्षेत्र में लगातार 1984 जब से अंगीभूत हुआ तब से लेकर आज तक राजमहल क्षेत्र की धरती के अंदर की जमीन का सीना तोड़कर कोयला निकाला जा रहा है। इस जमीन को देने वाले ज्यादातर रैयत आदिवासी है। जमीन को अधिग्रहित कर नियम के मिताबिक उसे पुनः वापस रैयत को पूर्व की तरह समतल कर दिया जाना है ,मगर समाज चीखते रहते है उनकी परियोजना द्वारा धैर्य से सुनी तक नहींं जाती है। यहां तक कि क्षेत्र के लोगो को जिस तरह की सुविधा का समझौता किया गया था उसपर भी पहल नही होती दिख रही है। सुनने वाला नही हो तो फरियाद किससे करें। वाली बात सामने आ जाती है। क्षेत्र के लोग आज सबसे आधारभूत सुविधाओं की बात की जाए तो कहने में परहेज नही की उसे पूरा करने के लिए मन्नत करनी पड़ती है। हर साल पेय जल के लिए लोगो को परेशान होना पड़ता है। यह शुभ घड़ी है कि आज राज्य में आदिवासी मुख्यमंत्री के हाथों कमान है। झारखंड सरकार से उम्मीद करते हैं कि पाँचवीं अनुसूची क्षेत्र कानून,जनजाति सलाहकार परिषद (टीएसी),पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार)अधिनियम 1996 जो पेसा के नाम से जाना जाता है। जनजातीय उप-योजना,सी एन टी/एस पी टी एक्ट इन सभी क़ानूनों को ईमानदारी से लागु कराए।

- झारखंड सोसाइटी के महामंत्री सह वरीय चिकित्सा।

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Editor - विलियम मरांड़ी।

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- राजीव कुमार (Editor-in-Chief)

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