Editorials : कोरोना और लॉकडाउन: कहीं तलाक़ तो कहीं शादी, यूं बदल गई रिश्तों की दुनिया



कितने अजीब रिश्ते हैं यहां के...

दो पल मिलते हैं,साथ-साथ चलते हैं

जब मोड़ आए तो बच के निकलते हैं...

कोविड-19 की महामारी के बाद की दुनिया को बॉलीवुड फ़िल्म 'पेज थ्री' का ये गाना बिल्कुल सटीक बयां करता है. एक वायरस ने दुनिया में रिश्तों को पूरी तरह से बदल डाला है.

लॉकडाउन के दौरान जब बहुत से लोग एक ही छत के नीचे रहने को मजबूर हुए. साथ-साथ ज़्यादा वक़्त बिताने लगे तो रिश्तों का तनाव खुलकर सामने आ गया.


मज़े की बात ये है कि हम जिन परिवार वालों से दूर-दूर रहते थे, लॉकडाउन के दौरान उनके साथ ज़्यादा वक़्त बिताने लगे. वहीं, दफ़्तर के जिन सहकर्मियों और अपने दोस्तों के साथ ज़्यादा रहते थे, उनसे दूरी बनाने लगे.

कोविड-19 से बचने के लिए लोग घरों की चारदीवारी में क़ैद हुए. फिर अर्थव्यवस्था बंद होने से रिश्तों पर आर्थिक दबाव भी पड़ा. नतीजा ये कि रिश्तों की डोर खिंच गई. तनाव बढ़ गया.


कोविड-19 ने रिश्तों को किस तरह बदला है?
इसे समझने के लिए हमें चीन और हॉन्ग कॉन्ग की मिसालें देखनी होंगी. क्योंकि नए कोरोना वायरस ने सबसे पहले चीन और हॉन्ग कॉन्ग पर ही हमला बोला था.

कोरोना वायरस के रिश्तों पर बुरे प्रभाव की सबसे बड़ी मिसाल चीन के शांक्ची प्रांत में देखने को मिली है. यहां के शियान शहर में तलाक़ के मामलों की बाढ़ सी आ गई है. ऑनलाइन दुनिया में शियान डिवोर्स के नाम से हैशटैग पर क़रीब सवा तीन करोड़ पोस्ट किए गए.

वुहान शहर, जहां से इस महामारी की शुरुआत हुई, वहां पर भी दांपत्य जीवन ख़तरे में नज़र आ रहे हैं. वुहान में भी सोशल मीडिया पर तलाक़ के मामलों की भारी संख्या देखने को मिली है.

वैसे तो चीन में तलाक़ के मामले 2003 से ही लगातार बढ़ रहे हैं. आज वहां लोग सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म वीचैट पर भी तलाक़ की अर्ज़ी दे सकते हैं.

लॉकडाउन के दौरान घरों में साथ-साथ ज़्यादा समय गुज़ारने को मजबूर दंपतियों के बीच घरेलू हिंसा और तलाक़ के मामलों में भारी इज़ाफ़ा हो गया है. घरेलू हिंसा के मामले तो यूरोप में भी बढ़ गए हैं. इनसे बचने की हेल्पलाइन पर कॉल की तादाद में बेतहाशा वृद्धि हुई है.

चीन और हॉन्ग कॉन्ग में भी यही स्थिति देखी जा रही है. घरेलू हिंसा से बचने के लिए महिलाएं अपने बच्चों के साथ शेल्टर होम में पनाह ले रही हैं.

हॉन्ग कॉन्ग में ऐसे ही शेल्टर होम में पनाह लेने वाली एक महिला पिंग पिंग (बदला हुआ नाम) बताती हैं कि लॉकडाउन से पहले भी उनका पति उनके साथ मार-पीट करता था. लेकिन, लॉकडाउन के बाद जब से वो घर में रहने लगा, तो बात-बात पर झगड़ा होने लगा. घर की साफ़-सफ़ाई से लेकर खाना बनाने तक, हर बात को लेकर तनाव बढ़ गया. वो अक्सर पिंग पिंग का बनाया हुआ खाना फेंक देता था. अब पिंग पिंग कहती हैं कि वो जल्द से जल्द तलाक़ ले लेना चाहती हैं.

हॉन्ग कॉन्ग की स्वयंसेवी संस्था हार्मनी हाउस की सुज़ाना लैम कहती हैं , "हालांकि हॉन्ग कॉन्ग में पूरी तरह से कभी लॉकडाउन नहीं लगाया गया. लेकिन जिन घरों में हिंसा नहीं हुई, वहां अलग तरह के तनाव देखने को मिले. घर की साफ़-सफ़ाई हो या फिर फ़िज़िकल डिस्टेंसिंग का पालन कैसे किया जाए. इन मसलों को लेकर घरों में झगड़े बढ़ गए हैं.

हॉन्ग कॉन्ग की सामाजिक मनोचिकित्सक शर्मीन श्रॉफ़ कहती हैं, "आज की तारीख़ में छोटी-छोटी बातों पर झगड़े हो रहे हैं. जैसे कि बच्चों को खेलने के लिए बाहर भेजा जाए या नहीं. इसके कारण परिवारों पर दबाव बढ़ा है. लॉकडाउन ने रिश्तों का सख़्त इम्तिहान लिया है."


लॉकडाउन के कारण एक और बड़ी समस्या ये पैदा हुई है कि घर के काम काज में इज़ाफ़ा हो गया है. घर में ही लोगों को क्वारंटीन किया गया. फिर बच्चों के स्कूल बंद होने से उन्हें पढ़ाने की चुनौती बढ़ गई और इस बढ़े हुए काम के बोझ का ज़्यादा हिस्सा महिलाओं को ही उठाना पड़ रहा है.

आज चीन में महिलाएं, घर के काम-काज में पहले के मुक़ाबले ढाई गुना ज़्यादा समय देने को मजबूर हैं. जानकार कहते हैं कि कोविड-19 के कारण नौकरी गंवाने का ज़्यादा दुष्प्रभाव महिलाएं ही झेल रही हैं. इसकी प्रमुख वजह तो ये है कि एक तो उनकी नौकरियां चली गईं. फिर उन्हें घर के काम का भी ज़्यादा बोझ उठाना पड़ रहा है.

महिलाएं ज़्यादातर उन उद्योगों में काम करती हैं जिन पर कोविड-19 की सबसे अधिक मार पड़ी है. जैसे कि होटल, रेस्टोरेंट, एयरलाइन या टूरिज़्म.

शंघाई की सुसी गाओ लॉकडाउन से पहले से ही नई नौकरी तलाश रही थीं. वो ऑनलाइन रिटेल सेक्टर में काम करती हैं. अब अर्थव्यवस्था की तालाबंदी के कारण वो घर पर रहने को मजबूर हैं. अपनी दो साल की बेटी की पूरी ज़िम्मेदारी सुसी के ही ऊपर आ गई है.

वो कहती हैं, "मैं जितने परिवारों को जानती हूं, उनमें से ज़्यादातर में आर्थिक बोझ मर्दों पर पड़ा है, तो घर के काम-काज का बोझ महिलाओं को उठाना पड़ रहा है."

चीन में जिन लोगों की नौकरी गई है उनमें से ज़्यादातर प्रवासी कामगार हैं जो चीन के ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों में आकर काम कर रहे थे. लॉकडाउन से पहले नए साल की छुट्टियों पर वो घर गए तो वहीं पर अटक गए.

हू शियाओहोंग ऐसी ही कामकाजी महिला हैं, जो बीजिंग में काम करती थीं. जनवरी में नए साल की छुट्टियों पर वो अपने पति और दो बच्चों के साथ गांव गईं, तो वहीं अटक गईं. क्योंकि लॉकडाउन लागू हो गया. अब वो काम पर नहीं लौट सकी हैं. लेकिन, गांव में रहने वाला उनका एक बेटा बहुत ख़ुश है. उसे मां-पिता के साथ ज़्यादा वक़्त बिताने को मिल रहा है.


आम तौर पर घरेलू रिश्तों के तनाव से बचने के लिए लोग दोस्तों और सहकर्मियों का सहारा लेते हैं. लेकिन, सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों के चलते लोगों का ये सपोर्ट सिस्टम भी दूर हो गया है.

हॉन्ग कॉन्ग की शर्मीन श्रॉफ़ कहती हैं, "पुरानी गतिविधियां जैसे कि लोगों से मिलना-जुलना, जिम जाना और बाहर खाना-पीना लॉकडाउन के दौरान बंद हो गया. तो हम दूसरे लोगों से जुड़ने के लिए डिजिटल नेटवर्क जैसे की सोशल मीडिया, वीडियो कॉल, मैसेज वग़ैरह के भरोसे ज़्यादा हो गए."

मगर, दुनिया में बहुत से लोग ऐसे हैं, जिनके पास इस तकनीक का सहारा नहीं है. हॉन्ग कॉन्ग की चाइनीज़ यूनिवर्सिटी की मनोवैज्ञानिक फैनी च्यूंग कहती हैं, "तकनीकी संसाधनों की उपलब्धता को लेकर बहुत असमानता है. आज भी बहुत से लोगों के पास संवाद के ये साधन नहीं हैं."

वहीं, युवा पीढ़ी आज इसी डिजिटल सपोर्ट सिस्टम के सहारे है. हो सकता है कि फ़ौरी तौर पर ये वर्चुअल दुनिया राहत देती हो. मगर, इस आभासी दुनिया में ज़्यादा वक़्त बिताने के बाद युवा पीढ़ी और भी अकेलापन महसूस करने लगती है.

कोरोना के कारण सामने आई एक नई दुनिया

वैसे तो महामारी ने जीवन में कई नई चुनौतियों को जन्म दिया है. मगर, बहुत से लोगों ने इस मुश्किल दौर में रिश्तों की नए सिरे से समीक्षा भी की है. शर्मीन श्रॉफ़ कहती हैं, "मैंने देखा है कि कई लोगों ने पुराने संबंधों को नए सिरे से जीवित करने की कोशिश की है. न सिर्फ़ दूसरे लोगों के साथ, बल्कि ख़ुद अपने जीवन में भी वो कई बदलाव लाए हैं."

चीन की सुसी गाओ कहती हैं, "इस महामारी के कारण मेरे पति, बेटी और बेटा आज ज़्यादा वक़्त साथ बिता रहे हैं. एक परिवार के तौर पर हम आज आपस में ज़्यादा संवाद करते हैं. मैं अपनी बच्ची के साथ ज़्यादा खेल पाती हूं. मेरा ये मानना है कि इस संकट के दौरान एक परिवार के तौर पर हम ज़्यादा क़रीब आए हैं."

वुहान में भले ही तलाक़ लेने की घटनाएं बढ़ गई हैं. मगर साथ ही शादी की अर्ज़ियां देने वालों की तादाद में भी इज़ाफ़ा हुआ है. जनवरी से अप्रैल के बीच, वुहान में शादी की अर्ज़ियों में 300 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है.


महामारी के मनोवैज्ञानिक प्रभाव
जानकार कहते हैं कि महामारी के बाद अचानक से मनोचिकित्सा की ज़रूरत बढ़ सकती है. 2003 में सार्स की महामारी ख़त्म होने के लंबे समय बाद भी लोग तनाव के शिकार रहे थे.

लेकिन, महामारी से सिर्फ़ बुरी ख़बरें भी नहीं निकल रही हैं. इसके कुछ सकारात्मक प्रभाव भी सामने आए हैं. इसके कारण परिवार और दोस्तों के बीच रिश्ते बेहतर हुए हैं. आज लोग परिवार की ज़्यादा चिंता करने लगे हैं. रिश्तों की अहमियत उन्हें क़रीब से समझ में आई है.

मानसिक स्वास्थ्य के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ी है. चीन और भारत जैसे देशों में जहां मानसिक बीमारियों को ख़राब माना जाता है, वहां पर इसके प्रति लोगों की संवेदनशीलता बेहतर हुई है.

लॉकडाउन के दौरान लोगों ने जिस तरह से मिल कर थाली बजाई और दिए जलाकर फ़्रंटलाइन कार्यकर्ताओं की हौसला अफ़ज़ाई की, उससे सामुदायिक भावना बढ़ी है.

हॉन्ग कॉन्ग की शर्मीन श्रॉफ़ कहती हैं, "आज लोगों में सामुदायिक एकता की भावना मज़बूत हुई है. आज लोगों में दूसरों की मदद का भाव भी बढ़ा है. ऐसा पहले नहीं देखा गया था."

सौजन्य : बीबीसी न्यूज़ 
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Editor - MOHIT KUMAR

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- राजीव कुमार (Editor-in-Chief)

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