अजित बालकृष्णन
'संक्रमण', 'सामाजिक दूरी', 'फैलाव', 'एकांतवास' और प्रसार जैसे शब्द अचानक हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गए हैं। ये शब्द राजनेताओं के भाषणों में भी दोहराए जा रहे हैं। जब समुदाय में कोविड-19 से संक्रमित किसी व्यक्ति का पता चलता है तो नागरिक और कानून प्रवर्तन से जुड़े लोग तत्काल यह प्रयास करते हैं कि 'बीमारी को तेजी से फैलाने वाले' का पता लगाया जाए और उसके संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति का पता लगाकर उसकी जांच की जाए। अचानक राज्याध्यक्षों से लेकर रिक्शा चलाने वाले तक तमाम लोग 'नेटवर्क विज्ञान' का इस्तेमाल करने लगे हैं। अब यह गूढ़ विज्ञान के विद्वानों का क्षेत्र भर नहीं रह गया है।
नेटवर्क के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी रखने वाले व्यक्ति से भी पूछिए तो वह आपको बताएगा कि नेटवर्क तो हम सब के आसपास हैं। इनमें से कुछ नेटवर्क ऐसे हैं जिनके बारे में सभी जानते हैं: उदाहरण के लिए दूरसंचार नेटवर्क और कंप्यूटर नेटवर्क। दूरसंचार नेटवर्क हमारी यानी टेलीफोन इस्तेमाल करने वालों की मदद करते हैं और टेलीफोन एक्सचेंज की मदद से हमें एक दूसरे से जोड़ते हैं। कंप्यूटर नेटवर्क हमें पर्सनल कंप्यूटर और स्मार्ट फोन की मदद से जोड़ते हैं और हमें संदेश, ध्वनि या वीडियो संदेश दूसरों को भेजने में मदद करते हैं। हम सभी जानते हैं कि ज्यादातर वक्त जहां टेलीफोन और स्मार्ट फोन नेटवर्क हमारे लिए बहुत अच्छा काम करते हैं, वहीं कई बार वे गड़बड़ भी साबित होते हैं और बातचीत नहीं हो पाती। कई बार वे परेशान करने वाले कारोबारी संदेश प्रसारित करते हैं और यहां तक कि इनके माध्यम से कई बार हमें ठगने वाले हमारे बैंक खाते की जानकारी और पासवर्ड तक उड़ा लेते हैं। इससे हमें आर्थिक नुकसान होता है।
इसके बाद ऐसे नेटवर्क आते हैं जिनके बारे में आम नागरिक कम जानते हैं लेकिन विद्वान उनके बारे में गहरा अध्ययन करते हैं। उदाहरण के लिए जीवविज्ञान से जुड़े नेटवर्क जहां प्रोटीन एक दूसरे से संपर्क करते हैं इन्हें 'डीएनए प्रोटीन नेटवर्क' या फिर इसे 'जीन को-एक्सप्रेशन नेटवक्र्स' कहा जाता है। ये सभी मनुष्य समेत तमाम जीवों मसलन पशुओं, पक्षियों या कीटों के जन्म, वृद्धि या उनके स्वास्थ्य से संबंधित रहती हैं। ये नेटवर्क दशकों तक सरकारी और निजी क्षेत्र की प्रयोगशालाओं के अध्ययन का विषय रहे हैं। इसके अलावा आजकल हर कोई इंटरनेट की सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट मसलन फेसबुक, लिंक्डइन, ट्विटर आदि का इस्तेमाल करता है।
हालांकि पिछले दो दशक या उसके आसपास के समय में यह चकित करने वाली बात सामने आई है उपरोक्त तमाम अलग तरह के नेटवर्क मसलन दूरसंचार, जीव विज्ञान, बीमारी आदि को कुछ आम अवधारणाओं की मदद से समझा जा सकता है।
सभी नेटवक्र्स की बात करें तो उनमें 'नोड' और 'एज' होते हैं। कोविड-19 के मामले में हम मनुष्य नोड हैं और एज वो हैं जो नेटवर्क तैयार करते हैं। इन एज की बात करें तो लैंडलाइन टेलीफोन के मामले में यह केबल हो सकती है, मोबाइल फोन के मामले में यह इलेक्ट्रॉनिक संकेत होता है और मानव सोशल नेटवर्क के मामले में यह एक मनोवैज्ञानिक भावना होता है कि लोग हमें पसंद करते हैं।
वैज्ञानिकों ने नेटवर्क के अन्य गुणधर्म भी विकसित किए हैं: मसलन नेटवर्क में नोड्स का आकार, घनत्व, डिग्री तथा डिग्री की केंद्रीयता आदि। ये तमात बातें आपको ऊबाऊ लग सकती हैं और आप सोच सकते हैं कि इन सबके बारे में वैज्ञानिक ही जानें मैं इन बातों को लेकर क्यों परेशान होऊं। परंतु जब इन्हें आम लोगों के नेटवर्क पर लागू किया जाता है तो यह दिलचस्प नतीजे पेश करता है।
ओल्ड बॉयज नेटवर्क वह होता है जहां आप केवल उन लोगों को अपनी कंपनी में नौकरी देते हैं जो उसी हाईस्कूल से पढ़े हों जिसमें आप पढ़े थे। सन 1950 के दशक तक देश की बहुराष्ट्रीय कंपनियों में यह नेटवर्क व्यापक रूप से मौजूद था। लोगों को नौकरियों के साक्षात्कार का अवसर पाने के लिए दून स्कूल, सेंट पॉल या लॉरेंस स्कूल से पढ़ा होना जरूरी होता था।
शोधकर्ताओं का कहना है कि अधिकांश सोशल नेटवर्क में समान लोगों के साथ लगाव नजर आता है। वे अपने जैसे लोगों के साथ रिश्ता बनाना पसंद करते हैं। इसमें सामाजिक वर्ग, नस्ल, लिंग, धर्म और पेशा आदि निर्णायक होते हैं। अमेरिका में हुए शोध बताते हैं कि 60 फीसदी शुरुआती रोजगार ऐसे ही सामाजिक नेटवर्क से मिलते हैं। शोधकर्ताओं ने आमतौर पर पाया कि श्रम बाजार खासकर प्रवासी बाजार में ऐसे नेटवर्क देखने को मिलते हैं।
इसके बाद बारी आती है वायरल वीडियोज की। इंटरनेट पर तमाम ऐसे वीडियो होते हैं जो अचानक लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्टï करते हैं और लोग इन्हें अपने दोस्तों और करीबियों को भेजना जारी रखते हैं। पिछले कुछ समय में कुछ वीडियो को 10 करोड़ से अधिक व्यूज मिले हैं। यह ऐसे ही वायरल होने की बदौलत हुआ है। परंतु किसी वीडियो के इस स्तर पर वायरल होने के पीछे की वजह अब तक स्पष्ट नहीं है।
वित्तीय क्षेत्र की भी इसमे अलग हिस्सेदारी है। इस प्रक्रिया को समझने के लिए वित्तीय संक्रमण शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। यह अंतराष्ट्रीय और घरेलू दोनों स्तरों पर हो सकता है। अब तक जो रुझान देखा गया है उसके मुताबिक वित्तीय बिचौलियों मे नाकामी का यह सिलसिला घरेलू बैंक या वित्तीय बिचौलियों की नाकामी से आता है और इसका पारेषण तब होता है जब वे अंतरबैंकीय देनदारी में चूक जाते हैं या अपनी परिसंपत्ति को कौडिय़ों के मोल बेच देते हैं। क्योंकि ऐसा करने से ऐसे अन्य बैंकों के परिसंपत्ति मूल्य पर सवाल खड़े हो जाते हैं।
इसके बाद बारी आती है उस शोध की जो नेटवर्क प्रभाव के बारे में बताता है। जब नेटवर्क प्रभाव मौजूद होता है तब किसी व्यक्ति को दी जाने वाली सेवाओं का मूल्य अन्य लोगों द्वारा किए जाने वाले उपयोग के साथ बढ़ता जाता है। मसलन जितने ज्यादा लोग क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करेंगे, उतनी अधिक दुकानें उसे स्वीकार करेंगी और इस प्रकार क्रेडिट कार्ड धारकों की तादाद बढ़ती जाएगी। समकालीन वेंचर कैपिटल उद्योग पर भी इसका प्रभाव है।
शायद अब वक्त आ गया है कि नेटवर्क विज्ञान को भौतिक विज्ञान, रसायन, पादप विज्ञान, गणित आदि की तरह स्कूलों और कॉलेज के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए। आने वाले दिनों में इसे व्यक्ति के शिक्षित का मानक बनाया जाए।
सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।
'संक्रमण', 'सामाजिक दूरी', 'फैलाव', 'एकांतवास' और प्रसार जैसे शब्द अचानक हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गए हैं। ये शब्द राजनेताओं के भाषणों में भी दोहराए जा रहे हैं। जब समुदाय में कोविड-19 से संक्रमित किसी व्यक्ति का पता चलता है तो नागरिक और कानून प्रवर्तन से जुड़े लोग तत्काल यह प्रयास करते हैं कि 'बीमारी को तेजी से फैलाने वाले' का पता लगाया जाए और उसके संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति का पता लगाकर उसकी जांच की जाए। अचानक राज्याध्यक्षों से लेकर रिक्शा चलाने वाले तक तमाम लोग 'नेटवर्क विज्ञान' का इस्तेमाल करने लगे हैं। अब यह गूढ़ विज्ञान के विद्वानों का क्षेत्र भर नहीं रह गया है।
नेटवर्क के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी रखने वाले व्यक्ति से भी पूछिए तो वह आपको बताएगा कि नेटवर्क तो हम सब के आसपास हैं। इनमें से कुछ नेटवर्क ऐसे हैं जिनके बारे में सभी जानते हैं: उदाहरण के लिए दूरसंचार नेटवर्क और कंप्यूटर नेटवर्क। दूरसंचार नेटवर्क हमारी यानी टेलीफोन इस्तेमाल करने वालों की मदद करते हैं और टेलीफोन एक्सचेंज की मदद से हमें एक दूसरे से जोड़ते हैं। कंप्यूटर नेटवर्क हमें पर्सनल कंप्यूटर और स्मार्ट फोन की मदद से जोड़ते हैं और हमें संदेश, ध्वनि या वीडियो संदेश दूसरों को भेजने में मदद करते हैं। हम सभी जानते हैं कि ज्यादातर वक्त जहां टेलीफोन और स्मार्ट फोन नेटवर्क हमारे लिए बहुत अच्छा काम करते हैं, वहीं कई बार वे गड़बड़ भी साबित होते हैं और बातचीत नहीं हो पाती। कई बार वे परेशान करने वाले कारोबारी संदेश प्रसारित करते हैं और यहां तक कि इनके माध्यम से कई बार हमें ठगने वाले हमारे बैंक खाते की जानकारी और पासवर्ड तक उड़ा लेते हैं। इससे हमें आर्थिक नुकसान होता है।
इसके बाद ऐसे नेटवर्क आते हैं जिनके बारे में आम नागरिक कम जानते हैं लेकिन विद्वान उनके बारे में गहरा अध्ययन करते हैं। उदाहरण के लिए जीवविज्ञान से जुड़े नेटवर्क जहां प्रोटीन एक दूसरे से संपर्क करते हैं इन्हें 'डीएनए प्रोटीन नेटवर्क' या फिर इसे 'जीन को-एक्सप्रेशन नेटवक्र्स' कहा जाता है। ये सभी मनुष्य समेत तमाम जीवों मसलन पशुओं, पक्षियों या कीटों के जन्म, वृद्धि या उनके स्वास्थ्य से संबंधित रहती हैं। ये नेटवर्क दशकों तक सरकारी और निजी क्षेत्र की प्रयोगशालाओं के अध्ययन का विषय रहे हैं। इसके अलावा आजकल हर कोई इंटरनेट की सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट मसलन फेसबुक, लिंक्डइन, ट्विटर आदि का इस्तेमाल करता है।
हालांकि पिछले दो दशक या उसके आसपास के समय में यह चकित करने वाली बात सामने आई है उपरोक्त तमाम अलग तरह के नेटवर्क मसलन दूरसंचार, जीव विज्ञान, बीमारी आदि को कुछ आम अवधारणाओं की मदद से समझा जा सकता है।
सभी नेटवक्र्स की बात करें तो उनमें 'नोड' और 'एज' होते हैं। कोविड-19 के मामले में हम मनुष्य नोड हैं और एज वो हैं जो नेटवर्क तैयार करते हैं। इन एज की बात करें तो लैंडलाइन टेलीफोन के मामले में यह केबल हो सकती है, मोबाइल फोन के मामले में यह इलेक्ट्रॉनिक संकेत होता है और मानव सोशल नेटवर्क के मामले में यह एक मनोवैज्ञानिक भावना होता है कि लोग हमें पसंद करते हैं।
वैज्ञानिकों ने नेटवर्क के अन्य गुणधर्म भी विकसित किए हैं: मसलन नेटवर्क में नोड्स का आकार, घनत्व, डिग्री तथा डिग्री की केंद्रीयता आदि। ये तमात बातें आपको ऊबाऊ लग सकती हैं और आप सोच सकते हैं कि इन सबके बारे में वैज्ञानिक ही जानें मैं इन बातों को लेकर क्यों परेशान होऊं। परंतु जब इन्हें आम लोगों के नेटवर्क पर लागू किया जाता है तो यह दिलचस्प नतीजे पेश करता है।
ओल्ड बॉयज नेटवर्क वह होता है जहां आप केवल उन लोगों को अपनी कंपनी में नौकरी देते हैं जो उसी हाईस्कूल से पढ़े हों जिसमें आप पढ़े थे। सन 1950 के दशक तक देश की बहुराष्ट्रीय कंपनियों में यह नेटवर्क व्यापक रूप से मौजूद था। लोगों को नौकरियों के साक्षात्कार का अवसर पाने के लिए दून स्कूल, सेंट पॉल या लॉरेंस स्कूल से पढ़ा होना जरूरी होता था।
शोधकर्ताओं का कहना है कि अधिकांश सोशल नेटवर्क में समान लोगों के साथ लगाव नजर आता है। वे अपने जैसे लोगों के साथ रिश्ता बनाना पसंद करते हैं। इसमें सामाजिक वर्ग, नस्ल, लिंग, धर्म और पेशा आदि निर्णायक होते हैं। अमेरिका में हुए शोध बताते हैं कि 60 फीसदी शुरुआती रोजगार ऐसे ही सामाजिक नेटवर्क से मिलते हैं। शोधकर्ताओं ने आमतौर पर पाया कि श्रम बाजार खासकर प्रवासी बाजार में ऐसे नेटवर्क देखने को मिलते हैं।
इसके बाद बारी आती है वायरल वीडियोज की। इंटरनेट पर तमाम ऐसे वीडियो होते हैं जो अचानक लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्टï करते हैं और लोग इन्हें अपने दोस्तों और करीबियों को भेजना जारी रखते हैं। पिछले कुछ समय में कुछ वीडियो को 10 करोड़ से अधिक व्यूज मिले हैं। यह ऐसे ही वायरल होने की बदौलत हुआ है। परंतु किसी वीडियो के इस स्तर पर वायरल होने के पीछे की वजह अब तक स्पष्ट नहीं है।
वित्तीय क्षेत्र की भी इसमे अलग हिस्सेदारी है। इस प्रक्रिया को समझने के लिए वित्तीय संक्रमण शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। यह अंतराष्ट्रीय और घरेलू दोनों स्तरों पर हो सकता है। अब तक जो रुझान देखा गया है उसके मुताबिक वित्तीय बिचौलियों मे नाकामी का यह सिलसिला घरेलू बैंक या वित्तीय बिचौलियों की नाकामी से आता है और इसका पारेषण तब होता है जब वे अंतरबैंकीय देनदारी में चूक जाते हैं या अपनी परिसंपत्ति को कौडिय़ों के मोल बेच देते हैं। क्योंकि ऐसा करने से ऐसे अन्य बैंकों के परिसंपत्ति मूल्य पर सवाल खड़े हो जाते हैं।
इसके बाद बारी आती है उस शोध की जो नेटवर्क प्रभाव के बारे में बताता है। जब नेटवर्क प्रभाव मौजूद होता है तब किसी व्यक्ति को दी जाने वाली सेवाओं का मूल्य अन्य लोगों द्वारा किए जाने वाले उपयोग के साथ बढ़ता जाता है। मसलन जितने ज्यादा लोग क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करेंगे, उतनी अधिक दुकानें उसे स्वीकार करेंगी और इस प्रकार क्रेडिट कार्ड धारकों की तादाद बढ़ती जाएगी। समकालीन वेंचर कैपिटल उद्योग पर भी इसका प्रभाव है।
शायद अब वक्त आ गया है कि नेटवर्क विज्ञान को भौतिक विज्ञान, रसायन, पादप विज्ञान, गणित आदि की तरह स्कूलों और कॉलेज के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए। आने वाले दिनों में इसे व्यक्ति के शिक्षित का मानक बनाया जाए।
सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।
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