Editorials : लॉकडाउन से बाहर आने का रोडमैप

शक्ति सिन्हा, निदेशक, अटल बिहारी वाजपेयी इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिसी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए यह चुनौतीपूर्ण समय है। कई राज्य सरकारें और अधिकांश विश्लेषक चाहते हैं कि लॉकडाउन का काल और बढ़ाया जाए, क्योंकि नए मामले लगातार सामने आ रहे हैं। अब तो उन इलाकों में भी संक्रमण फैलने लगा है, जो कोरोना से बचे हुए थे। यह सही है कि अपने यहां संख्या ज्यादा होने या आंकड़ों की आधार-रेखा की वजह से संक्रमित मरीजों के दोगुने होने की दर 11 दिन से ज्यादा है, लेकिन आने वाले दिनों में नए मामले आते ही रहेंगे। लेकिन इसके साथ-साथ, 40 करोड़ से अधिक लोगों की आजीविका का मसला भी हमारे सामने है। जिस तरह से लोगों की आमदनी खत्म हुई है, उससे कई परिवारों के फिर से गरीबी रेखा के नीचे खिसकने का खतरा बढ़ गया है।
भारतीय अर्थव्यवस्था का लगभग 65 फीसदी हिस्सा असंगठित क्षेत्र का है। उस पर से मुश्किल यह है कि 90 फीसदी से अधिक श्रम-बल अस्थाई है, जिसके पास सीमित कल्याणकारी अधिकार हैं। यदि जन-धन योजना (नकदी हस्तांतरण, जिससे किसान, ग्रामीण कामगार, गरीब पेंशनभोगी, निर्माण-कार्य करने वाले मजदूर, गरीब विधवा जैसी 35 करोड़ आबादी लाभान्वित हुई है) और आयुष्मान भारत (देश की 40 फीसदी जनसंख्या को पांच लाख रुपये तक मुफ्त चिकित्सा बीमा) जैसे कार्यक्रम नहीं चलाए गए होते, तो भारत आज एक भयावह स्थिति का सामना कर रहा होता। चूंकि हमारे यहां यूनिवर्सल बेसिक इनकम (न्यूनतम मासिक आय) या बेरोजगारी लाभ जैसी व्यवस्था नहीं है, इसलिए कमजोर आर्थिक स्थिति वाली आबादी की आमदनी जल्द सुनिश्चित करनी होगी, और इसके लिए अर्थव्यवस्था को फिर से गति देना बहुत आवश्यक है।
प्रधानमंत्री के सामने अब बड़ा सवाल यह है कि लाखों भारतीयों के जीवन को खतरे में डाले बिना लॉकडाउन को कैसे खोला जाए? मेरे सह-लेखक मॉरिस कुगलर ने अमेरिका के लिए छह विकल्प तैयार किए हैं। हम चाहें, तो इन्हें भारत में भी लागू कर सकते हैं।
इस महामारी को नियंत्रित करने का सबसे सुरक्षित तरीका यह है कि टीका विकसित होने तक लॉकडाउन को जारी रखा जाए और फिर सबको टीका लगाकर सुरक्षित कर दिया जाए।  दूसरा, लॉकडाउन में छूट धीरे-धीरे दी जाए और जब तक इस महामारी की वक्र रेखा समतल स्थिति में आएगी, इसका स्वास्थ्य और आर्थिक व्यापार संतुलन, दोनों मध्य श्रेणी में आ जाएगा। तीसरा विकल्प दूसरे से ज्यादा कठोर है, जिसमें अधिक से अधिक लॉकडाउन खोलने की बात तो है, लेकिन यदि संक्रमण की दर बढ़ती है, तो फिर से पूर्णबंदी की जाए। चौथा विकल्प है, एंटीबॉडी टेस्ट किए जाएं और इसमें जो संक्रमित न पाए जाएं, उन्हें लॉकडाउन से आजाद कर दिया जाए। पांचवें विकल्प के तहत हर दो हफ्ते में पूरी आबादी की एक बार जांच करने की बात कही गई है। छठा विकल्प है, संक्रमित मरीजों के संपर्क में आए लोगों का पता लगाना और जहां कहीं भी मामले सामने आएं, वहां व्यापक तौर पर जांच करना।
भारत के लिहाज से बात करें, तो पहला विकल्प हम नहीं अपना सकते, क्योंकि टीका बनने में लंबा वक्त लग सकता है। इसी तरह, आर्थिक व व्यवस्थागत वजहों और पर्याप्त संख्या में जांच किट के न होने के कारण हम चौथे और पांचवें विकल्पों की ओर भी नहीं बढ़ सकते। तीसरे विकल्प के साथ दिक्कत यह है कि इसमें स्वास्थ्य-लागत बेशक दूसरे विकल्प से कम आएगी, लेकिन आर्थिक सुधार कहीं अधिक संदिग्ध और लंबा होगा।
लिहाजा भारत के लिए एकमात्र व्यावहारिक रास्ता थोड़ा-बहुत संशोधन करते हुए दूसरे विकल्प और साथ-साथ छठे विकल्प को अपनाना हो सकता है। संशोधन यह कि लॉकडाउन को व्यापक पैमाने पर खोला जाए, लेकिन तमाम सुरक्षा उपायों में किसी तरह की कोताही न बरती जाए। चूंकि बच्चे और बुजुर्ग इस वायरस के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं, इसलिए इन आयु-समूहों को घरों में रखने का विकल्प भी हो सकता है। हालांकि भारत में यह संभव नहीं है, इसलिए भौगोलिक रूप से इसका निर्धारण करना सही तरीका हो सकता है। हॉटस्पॉट इलाकों की पहचान के साथ यह काम पहले से शुरू भी हो चुका है। इसी तरह, यदि कहीं कोविड-19 का संक्रमित मरीज पाया जाता है, तो बडे़ पैमाने पर आम लोगों की जांच करने के साथ-साथ संक्रमित मरीज के संपर्क में आए लोगों की पहचान भी आवश्यक है। हॉटस्पॉट की अपनी सीमाएं हैं और हमें उन लोगों की पहचान करनी चाहिए, जो वायरस के वाहक हैं। इसलिए, आरोग्य सेतु एप का इस्तेमाल, और पर्याप्त संख्या में जांच किट, व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) और वेंटिलेटर (स्थानीय कंपनियों से भी) की खरीद तेज करनी होगी। वैसे, संक्रमित मरीज के संपर्क में आए लोगों की खोज आसान काम नहीं। सिंगापुर भी ऐसे 20 फीसदी लोगों को खोजने में विफल रहा। मगर भारत के पास कोई दूसरा उपाय भी नहीं है।
हालांकि लॉकडाउन से भारत का बाहर निकलना तभी सार्थक होगा, जब सरकार और रिजर्व बैंक असाधारण और गैर-परंपरागत नीतियों के साथ आगे बढें़गे। भारत को राजकोषीय घाटे की चिंता नहीं करनी चाहिए, बल्कि कृषि और उद्योग में संरचनात्मक सुधार को तेज करना चाहिए। जैसे, कृषि-क्षेत्र के तहत बाजार को खोलना और वायदा कारोबार को बढ़ाना, जबकि उद्योग जगत के लिहाज से भूमि अधिग्रहण को आसान बनाना, नियुक्ति को प्रोत्साहित करना, कर-प्रणाली को आसान बनाना आदि।
इसी तरह, रिजर्व बैंक द्वारा मौद्रिक नीति में राहत देने के बावजूद बैंक कर्ज देने में सक्षम नहीं होंगे, क्योंकि एनपीए यानी डूबत कर्ज काफी ज्यादा है। इस मामले में हमें अमेरिका के फेडरल रिजर्व से सीखना चाहिए, और जिस तरह वह जोखिम वाले कॉरपोरेट बॉन्ड खरीद रहा है, आरबीआई को भी सरकार के साथ मिलकर एक सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई बनानी चाहिए, जो सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों को उनके कुछ शेयर लेकर अपने कर्ज कम करने के लिए पूंजी दे। एक बार जब कंपनी फिर से खड़ी हो जाएगी, तो उन शेयरों को बेचकर लागत निकाली जा सकती है। दूसरे और छठे विकल्प को संयुक्त रूप से अपनाने और सख्त राजकोषीय व मौद्रिक नीतियों पर आगे बढ़ने से भारत इस महामारी के दुष्प्रभाव को टाल सकता है। मुमकिन है कि इस उपाय से हमारी अर्थव्यवस्था इस साल के अंत तक सुधार की राह पर  बढ़ चले।     

सौजन्य - हिन्दुस्तान।                              
Share on Google Plus

Editor - न्यूज डेस्क, नई दिल्ली. Mob- 8800256688

ग्राम समाचार से आप सीधे जुड़ सकते हैं-
Whatsaap Number -8800256688
E-mail - gramsamachar@gmail.com

* ग्राम समाचार का संवाददाता बनने के लिए यहां क्लिक करें

- राजीव कुमार (Editor-in-Chief)

- राजीव कुमार (Editor-in-Chief)
    Blogger Comment
    Facebook Comment

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें