Bounsi News: प्रोजेक्टर से खेलनेवाले हाथ हो गये बेकार सरकार से पेंशन की मांग

ग्राम समाचार,बौंसी,बांका। 

सिनेमा व्यवसाय में नित नित आते बदलाव ने काफी बड़ी संख्या में अनुभवी तकनीशियनों के हाथों को बेकार भी किया है । एक आंकड़ों के अनुसार बिहार -झारखंड के सिनेमा घरों में बौंसी बाँका के प्रोजेक्टर औपरेटरोंं की खास मांग होती थी । जिन हाथों ने वर्षों तक नगर में बसने वाले लाखों लोगों को फिल्म दिखाकर वाहवाहियाँ बटोरी , वही हाथ अब महज पेट के लिये इलेक्ट्रोनिक्स मैकेनिक्स बनकर गुजारा करने को मजबूर हैं । सिनेमा उद्योग के इतिहास में कभी बिहार झारखंड में भागलपुर बाँका जिले के सिनेमा मालिकों का एकाधिपत्य था। 

वर्ष 1989 में बिहार का प्रथम फिल्म फेस्टिवल धनबाद में हुआ था , ऐसे में धनबाद झरिया के सारे सिनेमा गृहों को प्रदर्शन पेनोरामा दायरे में शामिल किया गया था । इसके संयोजक फिल्म लेखक निर्माता व निर्दशक प्रकाश झा थे , तब उनकी मात्र दो फिल्में रिलीज हुई थी -"हिप हिप हुर्रे " और "दामुल " । इस फिल्मोत्सव में शामिल निर्माता संजय सहाय की फिल्म "पतंग " गिरीश रंजन की " कल हमारा है " और शत्रुघ्न सिन्हा के सेक्रेट्री पवन कुमार की दो फिल्में "दुल्हा बिकता है " और "प्रेमगीत " जो बिहार में टैक्स फ्री थी का प्रदर्शन किया गया । इसी दौरान बौंसी के जेनरेटर मैकेनिक रामबिलास मिस्त्री धनबाद के रे टाकीज में बतौर प्रोजेक्टर तकनीशियन कार्यरत थे। कुमार टाकीज में घनश्याम शर्मा प्रोजेक्टर आपरेटर , गिरीडीह स्वर्ण में प्रकाश मिश्र , मोती में प्रदीप घोष , बैजनाथ देवघर में कैलाश राम 

कार्यरत थे। बांका के महेन्द्र सिंह और परमान के शुकदेव मिश्र ने इन लोगों को काफी प्रोत्साहित किया था । भागा में महेन्द्र बाबू ने सुनील टाकीज और अनिल टाकीज , शुकदेव मिश्र ने निरसा में विजय , गोमो में रंजना और धनबाद में कुमार टाकीज स्थापित कर एक इतिहास बनाया था । खस तौर से गणेश घोष , घनश्याम शर्मा , प्रदीप घोष , कैलाश राम और सुरो साव को सिनेमा जगत में प्रोजेक्टर हीरो कहा जाता था , इनके हाथों की उँगलियाँ जब फिल्म को ' स्प्रौकेट 'में सेट कर प्रोजेक्टर को स्टार्ट करती थी तो फिर दुबारा चेक करने की जरूरत नहीं पड़ती थी। पर्दे पर पड़नेवाले आर्क लाईट से कलाकारों के नाक के पतले पतले बाल भी दिखाई पड़ते थे । कम भीड़ में एम्प्लीफायर का कितना वाॅल्युम रखना है , इसके चारो एक्सपर्ट थे । कैलाश राम ने वैद्यनाथ टाकीज देवघर में भी अपना योगदान दिया था , उनदिनों वह हिम्मतवाला फिल्म को बेहतरीन तरीके से प्रोजेक्शन कर रहे थे । लखपुरा के मैनेजर इंदुभूषण झा ने कहा कि, यह लड़का गजब का जादूगर है , प्रोजेक्टर से ऐसे खेलता है जैसे कोई खिलौने से खेलता हो । 1960 में स्थापित सदाबहार में सदानंद झा ने 

सर्वप्रथम जापानी प्रोजेक्टर ' डेमरी प्रोजेक्शन और कलकत्ता प्रोडक्ट लगया । नंदिनी टाॅकीज में बालगोविंद ठाकुर ने मुम्बई की ' सुपर सिम्प्लेक्स ' प्रोजेक्टर और ' गामा ' कंपनी का आर्क लैम्प लगाकर लोकप्रियता हासिल की थी । 55 के दशक में गणेश ठाकुर द्वारा स्थापित गणेश चित्र मंदिर में कलकत्ता मेड ' हीरो ' एवं 'सुपर डायमंड ' प्रोजेक्टर का इस्तेमाल किया था । इसके अलावे यहाँ के आपरेटरों ने झारखंड के छबिगृहों में 75 एम एम और 35 एम एम की ' वेस्ट्रेक्स 14 एस सी आर टार्जन आदि प्रोजेक्टर पर काम किया । वर्तमान सेटेलाईट सिस्टम ने ऐसे फोकस के जदूगरों के जीवन को अंधकारमय कर दिया है , सरकार को इनके लिये कोई विकल्प ढूंढ़ना चाहिये ताकि, इनके हुनरमंद होने का इन्हें अफसोस ना हो । इस संदर्भ में बौंसी के अन्य आपरेटरों में केशव घोष , राजेश शर्मा , रोहित दूबे , कैलाश पाठक , अशोक शर्मा , दीपक पाठक , गोकूल दास , मोय बाबा , माखन शर्मा एवं मोहन यादव ने सभी आपरेटरों को कल्याण विभाग से पेंशन की माँग की है । 

कुमार चंदन,ग्राम समाचार संवाददाता,बौंसी।

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Editor - कुमार चन्दन, बाँका (बिहार)

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