सरकार के लाख प्रयासों के बाद भी यह प्रखंड बीमारी की हालात में

ग्राम समाचार, गोपीकांदर (दुमका)। आजादी के वर्षो बीत चुके है बाउजूद गोपीकांदर में स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति जस का तस है। सरकार बार बार स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारने की अधिकारियों को निर्देश दिए जा रहे है।लेकिन सामुदायिक केन्द्रो आज खुद ही बीमार चल रहे है।यदि सरकार स्वास्थ्य केन्द्रो के लिए कोई नया भवन भी बनाती है तो घूसखोरी और भ्रष्टाचारी से भवनों को निर्माणधीन छोड़ना पड़ता है ओर यही कारण है की आज गोपीकांदर जिले में सबसे पिछड़ा क्षेत्र है बाउजूद यहाँ स्वास्थ्य की कोई अच्छी सुविधा तक नही है। सरकार के लाख प्रयासों के बाद भी यह प्रखंड बीमारी की हालात में ही अपनी दिनचर्या व्यतीत कर रही है।

प्रखंड मुख्यालय में कहने को तो स्वास्थ्य उपकेन्द्र दर्जनों की तादात में है लेकिन इन केन्द्रो को सिर्फ गिनती की जा सकती है इलाज नही। मुख्यालय में एक मात्र सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र है जो भगवान भरोशे है। इस अस्तपताल की अच्छी सुविधा के लिए सरकार ने एक नया भवन का निर्माण कार्य शरू करवाया लेकिन भ्रष्टाचार और घूसखोरी में भवन अधर में ही छोड़ना पड़ा लाखो रूपये खर्च करने के बाद भवन आज अधर में पड़ा हुआ जगह जगह दरारे भी पड़ गए।भवन के खिड़कियों में लगे शीशे भी टूट फुटकर बेकार हो गया है।

जानकारी के मुताबिक इस अधूरे पड़े भवन के कार्यशैली पर दुमका उपायुक्त राहुल कुमार सिन्हा ने भी सवाल खड़े किये थे।बीते वर्ष गोपीकांदर प्रखंड मुख्यालय में दौरा के दौरान उपायुक्त ने भवन के सम्बंधित जेई के कार्यवाही करने की बात कहि थी साथ घपले हुए पैसे की रिकवरी करा कर भवन की फिर से निर्माण कार्य शरू करने की बात कहि थी।आज एक वर्ष पुरे होने को है कार्यवाही के नाम कुछ नही और न ही भवन का निर्माण कार्य अभी तक शुरू किया गया है।

गोपीकांदर का क्षेत्र ब्रेन मलेरिया और डायरिया जैसे जानलेवा बीमारियो का गढ़ माना जाता है।प्रत्येक वर्ष इन बीमारियो से कई के जाने जाती है।कुछ महीने पूर्व प्रखंड के कुश्चिरा पंचायत रोजगार सेवक की भी ब्रेन मलेरिया से मौत हो गई थी,जबकि दुसरा मामला बाबूपुर गांव है।ग्रामीण बबलू टुडु अपनी गर्भवती पत्नी को सामुदायिक केंद्र गोपीकांदर में भर्ती किया,रात में बबलू टुडु को डायरिया ने अपने आगोश में ले लिया और सुबह उसकी मौत हो गई। मौत के बाद केंद्र में इलाज नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की गई।

सरकारी आंकड़े की माने तो इस क्षेत्र में इन बीमारियो से मौत नही होती है,लेकिन इसकी हकिकत जाननी हो तो गांव की दहलीज में जानी पड़ती है।अधिकारी अपनी बचाव के लिए कई बहाने ढूढ़ते फिरते है।वर्ष 2016 में दुन्धवा,टेंजोर,आमेड सहित कई गांव थे जहां पर डायरिया ने अपना प्रकोप दिखाई थी।कई का तो इलाज गांव में किया गया जबकि दर्जनों को गोपीकांदर सामुदायिक केंद्र में भर्ती किया गया लेकिन इलाज करने के बजाए काठीकुंड रिची अस्तपताल रेफर करता गया।

– नितेश कुमार, ग्राम समाचार गोपीकांदर, दुमका।