तीन तलाक के बाद अब निकाह हलाला और बहुविवाह पर सुप्रीम नजर

supreme-court-159ग्राम समाचार,  नई दिल्ली। ट्रिपल तलाक को असंवैधानिक ठहराने के बाद मुसलमानों में बहुविवाह और निकाह हलाला की प्रथा की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ सुनवाई करेगी। इस अहम मसले को संविधान पीठ के सुपुर्द करने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और विधि आयोग से भी जवाब मांगा है।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अजय खानिवलकर, धनंजय चंद्रचूड की बेंच ने कहा, अगस्त 2017 में पांच सदस्यीय संविधान पीठ के बहुमत के फैसले में तीन तलाक को असंवैधानिक करार देने वाले मामले से बहुविवाह और निकाह हलाला के मुद्दे बाहर रखे गए थे।

अदालत ने कहा, बहुविवाह और निकाह हलाला के मुद्दे पर सुनवाई के लिए पांच सदस्यीय संविधान पीठ का गठन किया जाएगा। बहुविवाह की प्रथा के तहत मुस्लिम समुदाय में मुस्लिम व्यक्ति को चार बीवियां रखने की इजाजत है जबकि निकाह हलाला तलाक देने वाले शौहर से तलाकशुदा बीवी के दोबारा निकाह के संबंध में है।

निकाह हलाला वह प्रथा है जिसमे शौहर द्वारा तलाक दिए जाने के बाद उसी शौहर से दोबारा निकाह करने से पहले महिला को एक अन्य व्यक्ति से निकाह करके उससे तलाक लेना होता है।बहुविवाह और निकाह हलाला की प्रथा के खिलाफ अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने अपनी जनिहत याचिका में दावा किया कि मुस्लिम महिलाओं को उनके बुनियादी अधिकार दिलाने के लिए इन प्रथाओं पर प्रतिबंध लगाना जरूरी है। याचिका में कहा गया है कि तीन तलाक, बहुविवाह और निकाह हलाला की प्रथाओं की वजह से मुस्लिम महिलाओं को बहुत अधिक नुकसान हो रहा है और इससे उनके संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 में प्रदत्त मौलिक अधिकारों का भी हनन हो रहा है।

याचिका में अदालत से अनुरोध किया गया है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए सभी नागरिकों पर लागू होती है और तीन तलाक इस धारा के तहत महिला के प्रति क्रूरता है। इसी तरह, निकाह हलाला को भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के तहत बलात्कार और बहुविवाह को धारा 494 के अंतर्गत अपराध घोषित किया जाए। धारा 494 के अंतर्गत पति या पत्नी के जीवन काल में यदि कोई भी दूसरी शादी करता है तो यह अपराध है।

दिल्ली की एक मुस्लिम महिला ने भी 14 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर कहा कि मुस्लिम पर्सन लॉ की वजह से पति या पत्नी के जीवन काल में ही दूसरी शादी को अपराध के दायरे में लाने संबंधी भारतीय दंड संहिता की धारा 494 मुसलमानों के लिए निर्थक है और कोई भी शादीशुदा मुस्लिम महिला ऐसा करने वाले अपने शौहर के खिलाफ शिकायत दायर नहीं कर सकती है।महिला ने अदालत से अनुरोध किया है कि मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम, 1939 को असंवैधानिक और संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 और 25 के प्रावधानों का हनन करने वाला घोषित किया जाए। यह कानून मुस्लिम महिलाओं को बहुविवाह से संरक्षण से नहीं बचाता जबकि अन्य मजहबों की औरतों को कानून का संरक्षण प्राप्त है।

याचिकाकर्ता महिला का दावा है कि वह खुद इन प्रथाओं की पीड़ित है और उसका आरोप है कि उसका पति और परिवार उसे दहेज के लिए यातनाएं देते थे और उसे उसके वैवाहिक घर से दो बार बाहर निकाला गया है।

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि उसके शौहर ने कानूनी तरीके से तलाक दिए बगैर ही एक और औरत से शादी कर ली और पुलिस ने धारा 494 और धारा 498 ए के तहत प्राथमिकी दर्ज करने से इंकार कर दिया।इसी तरह 18 मार्च को हैदराबाद के एक वकील ने बहुविवाह प्रथा को चुनौती देते हुए कहा, मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत इस तरह की सारी शादियां मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकारों का हनन करती हैं।

याचिका में तर्क दिया गया है कि मुस्लिम कानून आदमियों को तो अस्थाई शादियों या बहुविवाह के जरिए कई बीवियां रखने की इजाजत देता है लेकिन मुस्लिम महिलाओं के लिए यह प्रावधान नहीं है। याचिकाकर्ता ने निकाह हलाला की प्रथा का भी विरोध किया है। निकाह मुताह और निकाह मिसयार का भी विरोध किया गया है। यह दोनों निकाह अस्थाई होते हैं और पूर्व निर्धारित निश्चित समय के लिए किए जाते हैं।